अनिल मिश्र / पटना
बिहार में वक्फ संपत्तियों का इतिहास और उनका सामाजिक-धार्मिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। राज्यभर में फैले खानकाहों, मजारों, जमीनों, मस्जिदों और ऐतिहासिक इमारतों का मकसद केवल धार्मिक आस्था का केंद्र होना नहीं था, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों की भलाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती देना था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज बिहार स्टेट सुन्नी वक्फ बोर्ड और बिहार स्टेट शिया वक्फ बोर्ड दोनों ही अपनी मूल जिम्मेदारी से भटकते हुए प्रशासनिक उदासीनता और विवादों का पर्याय बन चुके हैं।बेहिसाब संपत्तियां, पर आमदनी का अता-पता नहीं,दोनों वक्फ बोर्डों के पास पूरे बिहार में अरबों रुपये की कीमती संपत्तियां दर्ज हैं। यदि इन संपत्तियों का व्यावसायिक और पारदर्शी तरीके से प्रबंधन किया जाता, तो इनसे होने वाली आय से अनगिनत स्कूल, अस्पताल और हुनर केंद्र (स्किल डेवलपमेंट सेंटर) चलाए जा सकते थे। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश संपत्तियां या तो कौड़ियों के भाव लीज पर दी गई हैं या फिर उनका हिसाब-किताब ही गायब है। आखिर क्या वजह है कि इतनी अचल संपत्ति के बावजूद बोर्ड हमेशा आर्थिक तंगी और बदहाली का रोना रोता रहता है?पटना से लेकर राज्य के सुदूर जिलों तक वक्फ की जमीनों पर धड़ल्ले से अवैध कब्जे हो रहे हैं। कई मामलों में भू-माफियाओं के साथ मिलकर औकाफ की जमीनों की खरीद-फरोख्त तक के गंभीर आरोप सामने आते रहे हैं। सुन्नी और शिया, दोनों ही बोर्ड इन कब्जों को छुड़ाने के लिए कानूनी कार्रवाई करने में पूरी तरह नाकाम या बेपरवाह दिखते हैं। जब रक्षक ही खामोश बैठ जाए, तो वक्फ की हिफाजत कौन करेगा?दोनों बोर्डों की सबसे बड़ी कमजोरी स्थानीय मुतवल्लियों (देखरेख करने वालों) पर निगरानी न रख पाना है। कई जगहों पर वक्फ संपत्तियां व्यक्तिगत जायदाद की तरह इस्तेमाल हो रही हैं। यह प्रशासनिक सुस्ती इस बात का सबूत है कि बोर्ड के भीतर जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है।डिजिटल युग में भी पारदर्शिता से परहेज,
डिजिटल इंडिया के इस दौर में जब हर सरकारी महकमा अपनी जानकारी और कार्यप्रणाली ऑनलाइन सार्वजनिक कर रहा है, तब बिहार के दोनों वक्फ बोर्डों में पारदर्शिता का घोर अभाव है।वक्फ संपत्तियों का स्पष्ट और अद्यतन (Updated) डिजिटल रिकॉर्ड आम जनता के लिए आसानी से उपलब्ध क्यों नहीं है? किस संपत्ति से कितना किराया आता है और वह पैसा कहां खर्च होता है, इसका कोई सार्वजनिक ब्योरा क्यों नहीं मिलता?पारदर्शिता के अभाव में भ्रष्टाचार की गुंजाइश और बढ़ जाती है। शिया और सुन्नी, दोनों ही बोर्डों में अक्सर अंदरूनी गुटबाजी, सदस्यों के आपसी खींचतान और राजनीतिक आकाओं को खुश करने की होड़ दिखाई देती है। वक्फ के विकास और कौम के उत्थान के लिए योजनाएं बनाने के बजाय बोर्ड का वक्त प्रशासनिक बैठकों और औपचारिक बयानों तक सीमित होकर रह गया है।वक्फ कोई निजी या सरकारी संपत्ति नहीं है, बल्कि यह अमानत है जो अल्लाह के नाम पर समाज के कल्याण के लिए सौंपी गई थी। बिहार सुन्नी वक बोर्ड और बिहार सिया वक बोर्ड को अब अपनी गहरी नींद से जागना होगा। सभी वक्फ संपत्तियों का तीसरे (Third-party) से पारदर्शी ऑडिट कराया जाए।भू-माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ बिना किसी रियायत के कानूनी अभियान चलाया जाए। सभी जमीनों और आमदनी का ब्योरा ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाए।कौम और समाज अब खोखले दावों से संतुष्ट होने वाला नहीं है; उसे कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि धरातल पर ठोस और ईमानदार बदलाव होना चाहिए।
