मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : पश्चिम में दो रैलियां नहीं!

रुख-ए-सियासत : पश्चिम में दो रैलियां नहीं!

-२०२७ की सियासत का बदलता इशारा

तौसीफ कुरैशी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में रैलियां केवल भीड़ जुटाने का कार्यक्रम नहीं होतीं। यहां मंच पर कौन आया, किसने किसके लिए भीड़ जुटाई और किसके चेहरे पर मुस्कान कम या ज्यादा रही, इन सबका अपना राजनीतिक हिसाब होता है। इसलिए ३ सितंबर को रामपुर मनिहारान में जयंत चौधरी की ‘स्वाभिमान रैली’ और ठीक तीन दिन बाद ६ सितंबर को सहारनपुर में अखिलेश यादव की सभा को महज संयोग मान लेना शायद राजनीति को बहुत हल्के में लेना होगा।
पश्चिम की राजनीति इस समय एक अजीब मोड़ पर खड़ी है। जयंत चौधरी, जिन्हें कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने दादा चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था, भाजपा के साथ जाने के बाद उस पुराने सामाजिक समीकरण को फिर से साधने की चुनौती में हैं। जाटों का वह हिस्सा, जो भाजपा की विचारधारा से सहज नहीं था और चरण सिंह की विरासत के कारण रालोद के साथ बना रहता था, गठबंधन के बाद किस ओर जाएगा यही असली सवाल है। २०२२ में जाट मतदाताओं का बड़ा हिस्सा सपा-रालोद गठबंधन के साथ गया था। तब पश्चिम में एक अलग सामाजिक गठजोड़ बना था। आज रालोद भाजपा के साथ है और सपा के सामने चुनौती है कि उस खाली जगह को कौन भरेगा। शायद यही वजह है कि सपा कंपनी अब गुर्जर समाज और दूसरे सामाजिक समूहों में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
इसी पृष्ठभूमि में सहारनपुर की ६ सितंबर वाली सभा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके संयोजक चौधरी रुद्रसेन और चौधरी इंद्रसेन हैं, जिनके परिवार की पहचान केवल राजनीति से नहीं, बल्कि रैली और थैली दोनों की ताकत से रही है। उन्हें अपने पारिवारिक प्रभाव और संगठन क्षमता पर भरोसा है। इसीलिए कार्यक्रम की तैयारी अपने ही अंदाज में चल रहा है। लेकिन इससे सपा कंपनी की अंदरूनी बेचैनी भी सामने आ गई है। देवबन्द के पूर्व विधायक और देवबन्द से ही सपा के टिकट के मजबूत दावेदार मनोज चौधरी हों या नकुड़ से दावेदारी कर रहे साहिल खान शिकायत यही है कि कार्यक्रम की जानकारी और तैयारी में उन्हें शामिल नहीं किया जा रहा। रैली सफल होगी या नहीं, इस पर विरोध करने वालों को भी संदेह नहीं है। असली सवाल रैली की भीड़ नहीं, बल्कि उसके बाद बनने वाला राजनीतिक संदेश है।
उधर जयंत चौधरी की ‘स्वाभिमान रैली’ का नाम भी इस समय साधारण नहीं है। ‘चवन्नी’ वाले बयान के बाद स्वाभिमान का यह मंच किसे जवाब देगा, यह जनता समझती है और नेता भी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो नेता, दो मंच और सिर्फ तीन दिन का फासला है। सवाल यह नहीं कि भीड़ कितनी होगी। सवाल यह है कि २०२७ की राजनीति में किसके पास अपना वोट बचेगा और किसे नया वोट तलाशना पड़ेगा। दिक्कत दोनों के लिए है। मुसलमान रालोद से नाराज हैं और सपा के पास पश्चिम में यादव वोट ना के बराबर है और जो है, वह भी धार्मिक भावनाओं में बहकर भाजपा में चला जाता है तो उसके होने न होने से कोई फायदा नही है।
वैसे यादव जाति पूर्वांचल में भी वहीं सपा के साथ रहती है, जहां भाजपा यादव प्रत्याशी नहीं होता है। वह मुसलमान के जैसे बंधुआ मजदूर की तरह मजबूती से साथ नहीं रहता है। उसकी प्राथमिकता अपनी जाति यादव रहती है इसीलिए यादव जाति के विधायक सभी दलों से जीतकर आ जाते हैं। यह उनकी जाति की सियासी समझदारी है। राजनीति में सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है, जब नेता अपने पुराने वोट को स्थायी संपत्ति समझ बैठता है। पश्चिम की हवा फिलहाल यही कह रही है- वोट किसी की जागीर नहीं है और विरासत का सिक्का भी तभी चलता है, जब जनता उसे चलन में रखे।
सत्यमेव जयते
तिब्बत में हादसा, नेपाल में तबाही और भारत से खामोशी का इंतजार?
तिब्बत की पहाड़ियों में क्या हुआ, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन इतना साफ है कि भोटेकोशी नदी में आया पानी साधारण बारिश का पानी नहीं था। विशेषज्ञों की शुरुआती आशंकाओं में बर्फीला हिमस्खलन, नदी का अस्थायी रूप से अवरुद्ध होना और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट जैसी संभावनाएं शामिल हैं। नेपाल और चीन के वैज्ञानिक कारण तलाश रहे हैं।
लेकिन सवाल कारण का नहीं है। सवाल सूचना का है। अगर तिब्बत की तरफ कोई असामान्य घटना हुई थी, नदी का प्रवाह अचानक बढ़ने वाला था, कोई हिमस्खलन हुआ था या ऊपर पानी जमा होकर टूटने का खतरा था, तो नेपाल को चेतावनी क्यों नहीं मिली? सीमा के उस पार बैठा प्रशासन क्या देख रहा था? पहाड़ों में खतरे की सूचना भी अब राजनीतिक सीमा देखकर बहती है क्या? पानी को क्या मालूम कि चीन खत्म हुआ और नेपाल शुरू हो गया? वह तो ढलान देखता है और बह निकलता है। लेकिन सरकारें शायद नक्शा देखकर चेतावनी जारी करती हैं। भोटेकोशी में पानी इतनी तेजी से आया कि नेपाल के निचले इलाकों में अलर्ट जारी करना पड़ा और त्रिशूली के रास्ते कई जिलों तक खतरे की घंटी बज गई।
अब यह सिर्फ नेपाल का सवाल नहीं है। हिमालय की नदियां स्ाीमाएं नहीं मानतीं और उनकी तबाही भी पासपोर्ट लेकर नहीं आती। भारत को चीन से सीधा सवाल पूछना चाहिए क्या आपको पहले से खतरे की जानकारी थी? यदि थी, तो नेपाल और भारत को समय रहते क्यों नहीं बताया गया? और यदि नहीं थी, तो हिमालय जैसे संवेदनशील इलाके की निगरानी का इंतजाम आखिर किस काम का है? यह सवाल किसी युद्ध का नहीं, इंसानी जान का है। मगर हमारी मुश्किल यह है कि हम सवाल पूछने से पहले तस्वीर देखते हैं- कहीं सामने वाले मेहमान के स्वागत की तैयारी तो नहीं चल रही?
कूटनीति अपनी जगह है, मगर पड़ोसी से दोस्ती का मतलब यह तो नहीं कि उसके पहाड़ से आई मौत पर भी हम अपनी ज़ुबान बंद रखें। हिमालय पिघल रहा है। ग्लेशियर टूट रहे हैं। झीलें अस्थिर हो रही हैं। ऐसे में सूचना साझा करना एहसान नहीं, पड़ोसी धर्म है। चीन को जवाब देना चाहिए। नेपाल को जवाब मांगना चाहिए। और भारत को खामोशी नहीं, चेतावनी तंत्र की जवाबदेही मांगनी चाहिए। क्योंकि अगली बार पानी पूछकर नहीं आएगा कि नुकसान किस देश में करना है।
सत्यमेव जयते

अन्य समाचार