हिमांशु राज
दनकौर (गौतमबुद्धनगर) में आकाश आनंद की रैली ने बसपा को वापसी का आश्वासन देने के बजाय एक रणनीतिक प्रश्न छोड़ दिया है- क्या आक्रामक भाषण और क्षेत्रीय चेहरों की घोषणा पार्टी को २०२७ की सियासी जंग में निर्णायक रूप से वापस ला सकती है? आनंद ने योगी सरकार पर सरकारी विज्ञापन, पेपर लीक, खाली पद, कानून-व्यवस्था और बेरोजगारी पर कड़ी आलोचना की; साथ ही सपा-कांग्रेस पर भी ज़ोरदार हमले से यह संदेश दिया कि बसपा न तो शांत है और न ही मैदान छोड़ने को तैयार।
राजनीतिक यथार्थ तीन स्तरों पर साफ दिखता है। पहला, संगठनात्मक मजबूती का स्तर: पिछले चुनावों में बसपा का बूथ-स्तरीय नेटवर्क कमजोर पड़ा है। बिना लोकल कमेटियों, सक्रिय कार्यकर्ताओं और नियमित जन-संपर्क के केवल रैलियों से मतदान संरचना में बड़ा बदलाव मुश्किल है। दूसरा, जातीय और क्षेत्रीय समीकरण- पश्चिमी यूपी में गुर्जर और अन्य समुदायों को साधने की कवायद (जेवर से सतवीर सिंह नागर को संभावित प्रत्याशी घोषित करना) स्थानीय मुकाबलों में असर दे सकती है, पर समग्र राज्य स्तर पर बहुजन गठबंधन के पुराने आधारों को पुन: जोड़े बगैर सीमित ही रहेगा।
तीसरा, राजनीतिक संदेश और मतदाता संवेदनशीलता: आकाश के मुद्दे- अधिकारहीनता, प्रशासनिक विफलताएं और बेरोजगारी जन-आंदोलन पैदा कर सकते हैं, पर असल प्रभाव के लिए पार्टी को इन्हें रोज़मर्रा की जमीन पर योजनाओं और प्रत्याशियों के साथ जोड़ना होगा।
रणनीतिक रूप से बसपा को तीन काम एक साथ करने होंगे- पहला, संगठन का पुनर्गठन और बूथ-स्तरीय पुनर्निर्माण; दूसरा, स्पष्ट राजनैतिक गठबंधन या तीसरे मोर्चे की रणनीति (कहां सपा-कांग्रेस से भिड़ना है, कहां गठजोड़ की गुंजाइश है); तीसरा, संदेश का टार्गेटिंग- शहरी मध्यवर्ग, खेतिहर संकट से जूझते ग्रामीण और बेरोजगार युवा जिनकी आशंकाएं भिन्न हैं। अगर बसपा केवल आक्रामक भाषणों पर निर्भर रहेगी तो शोर जरूर बढ़ेगा पर वोट-बैंक पुनर्निर्माण नहीं होगा। आकाश आनंद का तीखा अंदाज बसपा को पुन: राजनीतिक चर्चा में ला सकता है और कुछ सीमित क्षेत्रों में शक्ति बढ़ा सकता है, पर २०२७ की मुख्य लड़ाई में लौटने के लिए उसे भाषणों के साथ ठोस संगठनात्मक सुधार, लक्ष्यभेदित जनसंपर्क और विवेकपूर्ण गठबंधन-रणनीति अपनानी होगी। अन्यथा तेज आक्रोश सिर्फ अस्थायी सुर्खियां पैदा करेगा, स्थायी मतदान बहाव नहीं।
