मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : अमेरिका-ईरान संघर्ष...ट्रंप अब आर्थिक युद्ध के मूड में

विजय-विमर्श : अमेरिका-ईरान संघर्ष…ट्रंप अब आर्थिक युद्ध के मूड में

विजयशंकर चतुर्वेदी

डोनाल्ड ट्रंप और उनके अधिकारियों पर भरोसा करें तो ईरान पूरी तरह पराजित हो चुका है और समझौते के लिए बेताब है। ट्रंप स्वयं कई बार घोषणा कर चुके हैं कि ईरान के साथ समझौता बस होने ही वाला है। लेकिन समझौता होता दिख नहीं रहा। अब अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईरान के खिलाफ एक बड़ा आर्थिक अभियान चलाने की बात कही है, जिसे वे ‘इकोनॉमिक डी-डे’ बता रहे हैं। चीन, यूएई, तुर्की आदि के साथ ईरान के आर्थिक रिश्तों पर दबाव बढ़ाने की भी उनकी योजना है।
विचित्र विरोधाभास यह है कि एक तरफ कहा जा रहा है कि ईरान घुटनों पर है, दूसरी तरफ उसे घुटनों पर लाने के लिए नए आर्थिक हमले की तैयारी भी की जा रही है! सवाल यह है कि अगर सैन्य अभियान ईरान को झुका नहीं सका, तो क्या आर्थिक नाकेबंदी उसे मजबूर कर पाएगी? ईरानी शासन ने पहले भी अनेक कड़े प्रतिबंधों का सामना किया है। अब वह महीनों की तीव्र बमबारी, अपने नेतृत्व के बड़े हिस्से को खोने और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों पर जवाबी कार्रवाई के बावजूद कायम है। ऐसे शासन को केवल धमकी और प्रतिबंधों के जरिए पस्त करना आसान नहीं होगा। आर्थिक युद्ध भी तभी सफल होता है, जब आपके पास उसे लागू कराने की पर्याप्त क्षमता हो और सामने वाले के पास विकल्प न हों।
होर्मुज की नाकेबंदी सबसे बड़ी चुनौती
अमेरिकी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल का आवागमन फिर से सामान्य करना है। कुछ तेल टैंकर अपने ट्रांसपोंडर बंद करके चोरी-छिपे इस जलमार्ग से गुजर भी रहे हैं। मगर निजी बीमा कंपनियां इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार नहीं। इसलिए अमेरिकी सरकार खुद बीमा उपलब्ध करा रही है। अमेरिकी सैन्य बल भी ईरानी ड्रोन और मिसाइलों से जहाजों की सुरक्षा में लगे हैं।
यह रणनीति पूरी तरह निरर्थक नहीं है। यदि किसी प्रकार से तेल का कुछ हिस्सा होर्मुज से गुजर रहा है तो इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार को कुछ राहत ही मिलेगी। अमेरिका ने दावा किया है कि प्रतिदिन लगभग एक करोड़ बैरल तेल निकल रहा है। लेकिन इसकी विश्वसनीयता पर सवाल इसलिए उठते हैं कि यह दावा वही ट्रंप प्रशासन कर रहा है, जिसकी युद्ध संबंधी घोषणाओं और आंकड़ों पर अब कोई भरोसा नहीं रह गया।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि ईरान पर अमेरिकी हमलों से वहां की सत्ता नहीं बदली। इसके उलट ईरान के जवाबी हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाया और अमेरिका को मजबूरन अपनी कुछ सैन्य तैनातियों का पुनर्गठन करना पड़ा। इंटरसेप्टर मिसाइलों के भारी इस्तेमाल ने भी अमेरिकी हथियार-भंडार को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में यदि ईरान को लगे कि केवल होर्मुज की नाकेबंदी पर्याप्त नुकसान नहीं पहुंचा रही, तो वह दुश्मन के इलाके में तेल प्रतिष्ठानों पर हमले बढ़ा सकता है।
पेट्रोल-डीजल है असली समस्या
आम उपभोक्ता कच्चा तेल नहीं जलाता। वह पेट्रोल और डीजल खरीदता है। इसलिए कच्चे तेल की कीमत में गिरावट का अर्थ यह नहीं कि पेट्रोल और डीजल भी उसी अनुपात में सस्ते हो जाएंगे। आज कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के बीच अंतर काफी बढ़ गया है।
इसे तेल बाजार की भाषा में ‘क्रैक स्प्रेड’ कहा जाता है। इसका एक कारण दुनिया में रिफाइनिंग क्षमता की कमी है। यूक्रेन द्वारा रूसी रिफाइनरियों पर किए गए हमलों ने भी इस समस्या को गहरा दिया है।
इसलिए यदि वित्त मंत्री बेसेंट किसी तरह होर्मुज से अधिक तेल निकलवाने में सफल भी होते हैं और इससे कच्चे तेल की कीमत कुछ नीचे आती है, तब भी अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों का संकट अपने आप खत्म नहीं होगा।
ईरान की सबसे बड़ी ताकत है चीन
अमेरिका जितनी देर तक ईरान के संकट में उलझा रहेगा, उतना ही उसका ध्यान एशिया-प्रशांत, चीन और दूसरे वैश्विक मोर्चों से हटेगा। ईरान के साथ खड़ा होकर चीन इस संकट में अमेरिका को और लंबे समय तक उलझाए रख सकता है। यही कारण है कि ईरान को पूरी तरह आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की अमेरिकी योजना व्यवहार में उतनी सरल नहीं होगी, जितनी वाशिंगटन में दिखाई जा रही है।
अमेरिकी नौसेना ने ईरानी तेल के निर्यात पर दबाव जरूर बनाया है। वर्ष २०२५ में ईरान को तेल निर्यात से लगभग ४५ अरब डॉलर की आय हुई थी, जो घट सकती है। ईरानी तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा चीन को जाता है। इसलिए ईरान को आर्थिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए अमेरिका को चीन के साथ टकराव का जोखिम उठाना पड़ेगा। मगर इसकी जगह अमेरिका उन देशों और कंपनियों पर अवश्य प्रतिबंध लगाना चाहेगा जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। हालांकि, ट्रंप प्रशासन कई देशों पर टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की घोषणा करके बाद में अपने कदम पीछे खींच चुका है, इसलिए उसकी धमकियों की विश्वसनीयता पहले जैसी नहीं रह गई।
सैन्य अभियान के बाद आर्थिक विजय का भ्रम
आर्थिक नुकसान पहुंचाना और किसी शासन को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना दो अलग बातें हैं। अमेरिका के सामने आज चुनौती यह है कि वह अपनी उस रणनीतिक भूलभुलैया से वैâसे बाहर निकले जिसमें सैन्य शक्ति के भरोसे एक जटिल क्षेत्रीय संकट को फटाफट हल करने की कोशिश की गई थी। यदि अमेरिका होर्मुज से निकलने वाले तेल के रास्ते को खोल भी देता है, तब भी यह तय नहीं है कि वह उस बड़े भू-राजनीतिक दलदल से निकल पाएगा, जिसमें वह बुरी तरह फंस चुका है।

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