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सम-सामयिक: छात्रों की गूंज राहुल गांधी के साथ देश की गूंज बन जाएगी

डॉ. सी. पी. राय

जून २०२६ के मध्य में राजस्थान के कोटा से शुरू हुआ राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान अब देश के कई शहरों में फैल चुका है। कोटा, देहरादून, प्रयागराज और हाल ही में पुणे तक पहुंचा यह कार्यक्रम शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, परीक्षाओं में गड़बड़ी, महंगी शिक्षा, भर्ती में देरी और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को छात्रों की जुबान से सरकार तक पहुंचाने का दावा करता है। जुलाई २०२६ में दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट-यूजी पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शन और उसके बाद की घटनाओं ने इस अभियान को और धार दी। पुणे में २२ अगस्त को सिर्फ छात्राओं के लिए आयोजित कार्यक्रम ने इसे महिला सशक्तिकरण और युवा आक्रोश का नया रूप दे दिया। अब सवाल यह है कि यह गूंज २०२७ के राज्य चुनावों और २०२९ के लोकसभा चुनाव तक कितनी दूर जाएगी और चुनावी नतीजों पर इसका क्या असर हो सकता है।
अभियान की पृष्ठभूमि और उद्देश्य
‘छात्रों की गूंज’ कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है। राहुल गांधी ने कोटा के दशहरा मैदान में छात्रों से संवाद करते हुए कहा था कि युवा अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं, जिसके कारण हैं- पेपर लीक, रद्द परीक्षाएं, दोबारा परीक्षाएं, खाली सरकारी पद और बढ़ती फीस। एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस को इस अभियान को देशव्यापी बनाने की जिम्मेदारी दी गई। प्रयागराज में उन्होंने आंकड़े पेश किए कि हर हजार युवाओं में से सिर्फ १२ को स्थायी नौकरी मिलती है। पुणे में छात्राओं से बात करते हुए महिलाओं की पहचान, सुरक्षा, पितृसत्ता और समान अवसरों पर जोर दिया गया। जंतर-मंतर की प्रदर्शनकारी छात्राओं से मुलाकात में उन्होंने उनके साहस की तारीफ की और पुलिस कार्रवाई की आलोचना की। ये घटनाएं दिखाती हैं कि अभियान सिर्फ रैलियों तक सीमित नहीं, बल्कि मौजूदा छात्र असंतोष को फैसलाकुन मंच देने की कोशिश है।
बढ़ता प्रभाव और राजनीतिक बहस
इस अभियान का असर नजर आने लगा है। कोटा से शुरू हुई गूंज ने कोचिंग हब के लाखों छात्रों को आकर्षित किया। देहरादून और प्रयागराज में लाखों युवा जुटे। पुणे में पुलिस की ३० शर्तों के बावजूद हजारों छात्राओं की उपस्थिति और राजनीतिक बहस ने महाराष्ट्र की राजनीति में इसे चर्चा का विषय बना दिया। विपक्ष इसे युवाओं की वास्तविक पीड़ा बताता है, जबकि सत्तापक्ष इसे भीड़ जुटाने और पीआर का खेल करार देता है। असलियत यह है कि परीक्षा प्रणाली की खामियां खासकर एनटीए से जुड़ी घटनाएं युवाओं में गुस्सा बढ़ा रही हैं। यह गुस्सा अगर संगठित रूप लेता है तो चुनावी मुद्दा बन सकता है।
ऐतिहासिक छात्र आंदोलनों का संदर्भ
इतिहास हमें याद दिलाता है कि छात्र आंदोलन सिर्फ कक्षाओं या कॉलेज परिसरों तक नहीं रहते। वे अक्सर राजनीतिक भूकंप लाते हैं। स्वतंत्र भारत में सबसे प्रभावशाली उदाहरण गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन (१९७३-७४) है। अमदाबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज में हॉस्टल मेस फीस बढ़ाने के विरोध से शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही महंगाई, भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ राज्यव्यापी संघर्ष बन गया। चिमनभाई पटेल की सरकार गिर गई, विधानसभा भंग हुई और राष्ट्रपति शासन लगा। यह पहला मौका था जब छात्र आंदोलन ने चुनी हुई सरकार को सीधे उखाड़ फेंका।
इसकी गूंज बिहार तक पहुंची। १९७४ में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा गूंजा। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ शुरू हुए छात्र आंदोलन ने पूरे देश को हिला दिया। इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेता की सरकार चली गयी थी, और १९७७ में जनता पार्टी की जीत हुई। इस आंदोलन से बहुत से छात्र नेता देश के बड़े नेता बन कर उभरे। नवनिर्माण और जेपी आंदोलन ने साबित किया कि जब युवा मुद्दे व्यापक सामाजिक असंतोष से जुड़ जाते हैं तो सत्ता बदल सकती है।
अन्य आंदोलन भी याद रखने लायक हैं। १९६५ का हिंदी विरोधी आंदोलन, असम आंदोलन, मंडल आयोग विरोधी प्रदर्शन, ये सब छात्रों की भागीदारी से मजबूत हुए। इनमें से कुछ नीतियां बदलने में सफल रहे, कुछ सिर्फ बहस पैदा कर सके। लेकिन सबने एक बात साफ की कि छात्र शक्ति को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ता है। आज का ‘छात्रों की गूंज’ इन आंदोलनों की तरह बड़े पैमाने पर अभी तक नहीं पहुचा है, लेकिन अभी शुरुआत है । यह अभी संवाद और हस्ताक्षर अभियान के रूप में है। लेकिन पेपर लीक जैसी बार-बार दोहराई जाने वाली समस्याएं और रोजगार का संकट इसे व्यापक बनाने की संभावना रखते हैं।
२०२७ और २०२९ के चुनावों पर संभावित प्रभाव
२०२७ और २०२९ के चुनावों तक इस गूंज का सफर कैसा रहेगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है। २०२७ में कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे युवा आबादी वाले राज्यों में शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पहले से संवेदनशील हैं। अगर अभियान इन राज्यों में संगठित रूप लेता है, स्थानीय छात्र संगठनों से जुड़ता है और ठोस मांगें जैसे परीक्षा सुधार, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, शिक्षा लागत में कमी के मुद्दों को लेकर आगे बढ़ता है तो युवा वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। युवा मतदाता आज पहले से ज्यादा जागरूक और सोशल मीडिया सक्रिय हैं। अगर वे महसूस करते हैं कि उनकी आवाज सुनी जा रही है तो विपक्ष को जबरदस्त लाभ मिल सकता है।
२०२९ के लोकसभा चुनाव में यह और महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। बेरोजगारी और शिक्षा की गुणवत्ता लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। अगर ‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ रैलियों तक सीमित रहती है तो इसका असर सीमित रहेगा। लेकिन अगर यह ठोस नीतिगत एजेंडा बन जाता है जैसे स्वतंत्र परीक्षा नियामक, रोजगार गारंटी से जुड़े प्रस्ताव या शिक्षा में सुधार के स्पष्ट वादे तो यह चुनावी मुद्दा बन सकता है। इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलन जब सिर्फ विरोध तक रहते हैं तो उनका प्रभाव कमजोर पड़ता है। जब वे वैकल्पिक विजन पेश करते हैं तो सत्ता बदलने की ताकत रखते हैं और राहुल गांधी वैकल्पिक दृष्टि भी पेश करते हुए दिखलाई पड़ रहे और उस दिशा में उनका थिंक टैंक ठोस विचार बनाता हुआ दिख रहा है।
चुनौतियां और आगे की राह
चुनावी असर के कई पहलू हैं। एक तरफ यह कांग्रेस और सहयोगी दलों को युवाओं से जोड़ने का मौका देता है। राहुल गांधी की छवि को ‘युवाओं के नेता’ के रूप में इस अभियान ने मजबूत किया है। दूसरी तरफ चुनौतियां भी कम नहीं। भीड़ जुटाने के आरोप, संगठनात्मक कमजोरी और सत्तापक्ष की चालबाजियां इसे कमजोर कर सकते हैं। युवा मतदाता सिर्फ भाषणों से प्रभावित नहीं होते। उन्हें परिणाम चाहिए नौकरियां, पारदर्शी परीक्षाएं, सस्ती शिक्षा। अगर अभियान इन पर ठोस काम नहीं दिखाता तो गूंज फीकी पड़ सकती है।
पुराने आंदोलनों से सबक लेना जरूरी है। नवनिर्माण और जेपी आंदोलन इसलिए सफल हुए क्योंकि वे महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़े। आज के युवा मुद्दे भी सिर्फ परीक्षा तक नहीं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कौशल विकास, मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक समानता भी शामिल हैं। पुणे कार्यक्रम में छात्राओं पर फोकस ने इस दिशा में संकेत दिए। अगर अभियान इन मुद्दों को जोड़ता है तो इसकी पहुंच बढ़ सकती है।
अंत में ‘छात्रों की गूंज’ अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है। जंतर-मंतर की घटनाओं ने इसे भावनात्मक ताकत दी, पुणे ने इसे लैंगिक आयाम दिया। लेकिन चुनावी असर के लिए इसे लगातार, संगठित और नीति-आधारित बनाना होगा। इतिहास गवाह है कि छात्र आवाज जब सही समय पर सही दिशा में गूंजती है तो वह सिर्फ गूंज नहीं रहती, वह परिवर्तन का स्वर बन जाती है। २०२७ और २०२९ के चुनाव बताएंगे कि यह गूंज सिर्फ रैलियों की गूंज थी या युवा भारत की वास्तविक आवाज। फिलहाल यह आवाज सुनाई दे रही है। अब देखना है कि इसे कितनी दूर तक पहुंचाया जाता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक विचारक हैं)

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