मुख्यपृष्ठस्तंभचंपत राय की चिट्ठी ने फिर खोल दिया अयोध्या का पिटारा!

चंपत राय की चिट्ठी ने फिर खोल दिया अयोध्या का पिटारा!

-राम मंदिर के फैसलों में किसकी चलती थी?
-पूर्व महासचिव ने नृपेंद्र मिश्र की भूमिका पर उठाए सवाल
– चढ़ावा चोरी की जांच से निकला नया सियासी सिरदर्द
-२०२७ से पहले भाजपा के लिए अयोध्या फिर संवेदनशील मोर्चा

अयोध्या। राम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी का विवाद अभी पूरी तरह ठंडा भी नहीं पड़ा था कि पूर्व महासचिव चंपत राय की एक लंबी चिट्ठी ने अयोध्या की व्यवस्था और फैसलों की पूरी श्रृंखला को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। सवाल अब केवल यह नहीं रह गया कि चोरी किसने की, बल्कि यह भी है कि मंदिर के निर्माण और प्रबंधन में वास्तविक निर्णयकर्ता कौन था और किसके पास कितनी शक्ति थी।
हाल में सामने आई चंपत राय की कथित चिट्ठी में राम मंदिर आंदोलन से लेकर निर्माण, धार्मिक व्यवस्थाओं, चंदा संग्रह और बैंकिंग प्रणाली तक अनेक बिंदुओं का उल्लेख है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण दावा यह है कि निर्माण से जुड़े बड़े फैसले मंदिर निर्माण समिति के स्तर पर होते थे और समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र के निर्णय के बिना कोई महत्वपूर्ण काम आगे नहीं बढ़ता था। यहां तक कहा गया है कि अलग निर्णय होने पर भी अंतिम व्यवस्था समिति के निर्णय के अनुसार ही चलती थी। यही वह बिंदु है, जिसने पूरे विवाद की दिशा बदल दी है।
चढ़ावा चोरी प्रकरण सामने आने के बाद जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा ट्रस्ट प्रबंधन और तत्कालीन महासचिव चंपत राय की ओर जाता दिखाई दे रहा था। ७ जून को मामला सार्वजनिक हुआ, १३ जून को योगी सरकार ने एसआईटी बनाई और बाद में गिरफ्तारियां भी हुर्इं। चंपत राय और ट्रस्ट सदस्य अनिल मिश्र ने अपने पद छोड़ दिए। जांच के शुरुआती चरण में आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन चंपत राय का नाम आरोपी के रूप में उसमें नहीं था।
अब यदि चंपत राय के पत्र की मूल बात को स्वीकार किया जाए, तो सवाल का दायरा बढ़ता है। यदि फैसलों की असली शक्ति निर्माण समिति के पास थी तो जवाबदेही की सीमा केवल ट्रस्ट महासचिव तक क्यों रहे?
नृपेंद्र मिश्र ने भी इस पूरे विवाद से दूरी बनाई है। उनका कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई पत्र देखा नहीं और मनगढ़ंत तरीके से विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर निर्माण में केंद्र या राज्य सरकार का एक रुपया नहीं लगा और पूरा निर्माण श्रद्धालुओं से जुटाए धन से हुआ। साथ ही उन्होंने मंदिर के पूरे हो चुके कार्यों का आंतरिक ऑडिट कराने की सलाह भी दी है।
यहीं योगी सरकार के लिए राजनीतिक मुश्किल पैदा होती है। अयोध्या केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, भाजपा की राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक आधार है। चढ़ावा चोरी जैसे आरोप इसलिए सामान्य वित्तीय अनियमितता से कहीं अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुरुआत से जांच और कार्रवाई का संदेश देकर नुकसान नियंत्रित करने की कोशिश की। जून में उनके अयोध्या दौरे के प्रोटोकॉल में चंपत राय की जगह ट्रस्ट के किसी प्रतिनिधि को शामिल किया जाना भी उसी राजनीतिक दूरी के रूप में देखा गया था।
अब चंपत राय की चिट्ठी इस रणनीति में नया पेच डालती है। यदि वह केवल अपना बचाव कर रहे हैं तो सवाल है कि तथ्य क्या हैं। और यदि उनका दावा सही है कि निर्णयों की शक्ति दूसरी संस्थागत परत में केंद्रित थी, तो जांच को उस दिशा में भी जाना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल इसलिए अभी भी वही है कि चढ़ावे की चोरी किसने की, किसे इसकी जानकारी थी और किस स्तर पर निगरानी विफल हुई। चुनाव से पहले भाजपा के लिए असली खतरा आरोप नहीं, बल्कि इन प्रश्नों का अधूरा रह जाना है।
नृपेंद्र मिश्र का जवाब
नृपेंद्र मिश्र ने कथित पत्र को लेकर कहा कि उन्होंने ऐसा दस्तावेज देखा ही नहीं है और विवाद खड़ा करने के लिए अफवाहें पैâलाई जा रही हैं। साथ ही उन्होंने मंदिर के पूर्ण हो चुके निर्माण कार्यों का आंतरिक ऑडिट कराने की सलाह दी है। और यही सलाह अब पारदर्शिता की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी बन सकती है।
क्लीन चिट के बाद भी खत्म नहीं हुए सवाल
हाल की रिपोर्टों के अनुसार एसआईटी की अंतिम जांच में चंपत राय और अनिल मिश्र को आरोपी नहीं बनाया गया। लेकिन प्रशासनिक या आपराधिक क्लीन चिट और संस्थागत जवाबदेही दो अलग बातें हैं। मंदिर जैसे विशाल धार्मिक संस्थान में वित्तीय नियंत्रण किसके हाथ में था, यह प्रश्न अभी भी सार्वजनिक महत्व का है।

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