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चंदा चोरी की भनक थी…फिर भी चुप रहे चंपत राय?.. चुनावी नुकसान रोकने के लिए दबा रहा मामला?.. भूमिका पर नया सवाल

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

राम मंदिर के चढ़ावा चोरी का मामला अब केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं है कि पैसा किसने उठाया। बड़ा सवाल यह है कि जब गड़बड़ी की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी तो मामला तत्काल सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ और पुलिस कार्रवाई में इतनी देर क्यों लगी?
रिकॉर्ड बताता है कि कथित हेराफेरी ७ जून २०२६ को सामने आई, लेकिन एफआईआर २५ जून को दर्ज हुई। इसी अंतराल को लेकर फैजाबाद बार एसोसिएशन ने भी कथित कवर-अप का आरोप लगाया और वरिष्ठ ट्रस्ट पदाधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की। चंपत राय का पक्ष इससे अलग है। उन्होंने दावा किया कि चोरी पकड़ने के लिए छिपे कैमरे लगवाने की पहल उन्होंने स्वयं की थी और उन्हीं कैमरों से कथित हेराफेरी का खुलासा हुआ। उन्होंने धन के दुरुपयोग में अपनी भूमिका से इनकार किया, लेकिन राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होता।
अयोध्या से उठी बीजेपी की जवाबदेही की चुनौती
यह सवाल इसलिए और गंभीर है, क्योंकि अयोध्या भाजपा की राजनीतिक और वैचारिक राजनीति का केंद्रीय प्रतीक है। यदि राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी की खबर चुनावी माहौल में फैलती, तो विपक्ष इसे सीधे भाजपा की प्रशासनिक और नैतिक जवाबदेही से जोड़ सकता था।
एफआईआर में देरी ने बढ़ाया शक

राम मंदिर से जुड़ी कथित चोरी के मामले में घटना और एफआईआर के बीच का अंतराल कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या मामला दबाकर रखने की कोशिश हुई, या देरी के पीछे कोई प्रशासनिक वजह थी? जांच को अब चोरी के आरोपी तक सीमित रखने के बजाय यह भी स्पष्ट करना होगा कि सूचना किसे, कब मिली और कार्रवाई में देरी क्यों हुई।
क्या चुनावी असर से घबराई व्यवस्था?
क्या मामला इसलिए कुछ समय तक भीतर ही संभालने की कोशिश हुई कि राम मंदिर से जुड़ी चोरी की खबर बाहर आने पर भाजपा और योगी सरकार को चुनावी नुकसान हो सकता था? उपलब्ध दस्तावेज इस मंशा को सीधे सिद्ध नहीं करते, पर घटना और एफआईआर के बीच का अंतराल इस प्रश्न को जन्म जरूर देता है।
सिर्फ चोर नहीं, देरी का सच भी सामने आए
अब आवश्यकता इस बात की है कि जांच केवल यह न बताए कि चोरी किसने की, बल्कि यह भी स्पष्ट करे कि किसे कब जानकारी मिली, किसने पुलिस को कब बताया और कार्रवाई में देरी क्यों हुई। यदि देरी का कोई प्रशासनिक कारण था तो उसे सार्वजनिक किया जाए; और यदि राजनीतिक नुकसान के डर से सूचना रोकी गई, तो मामला चोरी से कहीं बड़ा हो जाएगा।

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