– आदिवासी छात्रों पर उम्र की दीवार हटानी पड़ी
-पांच दिन में दूसरी बार मांग मानने को मजबूर सत्ता
सामना संवाददाता / मुंबई
राजनीति में प्रभाव का पैमाना भाषण नहीं, सत्ता से फैसला बदलवा पाना होता है। इस कसौटी पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों भाजपा सरकारों के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरे हैं। महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रों का मामला इसका ताजा उदाहरण है। सरकारी आदिवासी छात्रावासों में प्रवेश के लिए लगाई गई ३० वर्ष की अधिकतम उम्र सीमा के खिलाफ छात्र आंदोलन कर रहे थे। पुणे में छात्रों से बातचीत के दौरान राहुल गांधी ने उनकी समस्या सुनी और यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वे उनके आंदोलन में शामिल होंगे। इसके बाद राहुल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर उम्र सीमा समेत छात्रों की समस्याओं पर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
`राहुल बोलते हैं, सरकार झुकती है’
लोकसभा नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद महाराष्ट्र सरकार का ३० वर्ष की उम्र सीमा खत्म करने का फैसला अब सियासी बहस के केंद्र में है। आंदोलनरत छात्रों की मांग पर अचानक बदले सरकारी रुख ने सवाल खड़ा कर दिया है, क्या राहुल का दबाव सत्ता पर असर दिखा रहा है? हाल के दिनों की घटनाएं इस दावे को और हवा दे रही हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने तो इसे और तीखे शब्दों में कहा, ‘राहुल गांधी इस सरकार से कुछ भी करा सकते हैं।’ दो घटनाएं अकेले राजनीतिक वर्चस्व साबित नहीं करतीं, लेकिन संकेत साफ है, अब राहुल सवाल उठाते ही नहीं, उनके सवाल सत्ता तक पहुंच रहे हैं और जवाब फैसलों में दिखाई देने लगा है।
बता दें कि राहुल के पत्र के अगले ही दिन महाराष्ट्र सरकार ने ३० वर्ष की उम्र सीमा समाप्त करने का पैâसला कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, इस मुद्दे पर आदिवासी मंत्री और विधायकों की तत्काल बैठक भी हुई। यानी जो मांग आंदोलनरत छात्र दिनों से उठा रहे थे, राहुल गांधी के सीधे हस्तक्षेप के बाद उस पर सत्ता को कदम पीछे खींचना पड़ा। हालांकि छात्रों की दूसरी मांगें अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं और कुछ स्थानों पर आंदोलन जारी रहा। दिलचस्प यह कि पांच दिन के भीतर यह दूसरा ऐसा घटनाक्रम है। २१ अगस्त को दिल्ली में पेलेट गन से घायल छात्र की शिकायत पर एफआईआर की मांग को लेकर राहुल गांधी करीब पांच घंटे धरने पर बैठे। आखिरकार एफआईआर दर्ज हई।
