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जेन-जेड के जंतर-मंतर से फिर घबराई सत्ता?

-सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन रोकने से किया इनकार, केंद्र अब मुकदमे वापस लेने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
-सितंबर की प्रस्तावित मार्च से पहले सरकार के रुख में नरमी के संकेत

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

देश की राजनीति में जेन-जेड अब केवल सोशल मीडिया की पीढ़ी नहीं रही। पेपर लीक, बेरोजगारी, स्कूलों की दुर्दशा और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सड़क पर उतरती युवा भीड़ ने सत्ता प्रतिष्ठान को नई चिंता में डाल दिया है। नेपाल और बांग्लादेश के युवा आंदोलनों की पृष्ठभूमि में भारत में जंतर-मंतर पर फिर बड़े छात्र जमावड़े की तैयारी ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है।
कॉकरोच जनता पार्टी ने ५ सितंबर को दिल्ली में बड़े मार्च का आह्वान किया है। इसे रोकने की मांग सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि अभी यह मान लेने का कोई आधार नहीं है कि प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था बिगड़ेगी। अदालत ने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था संभालना सरकार और पुलिस का काम है।
राजनीतिक बेचैनी की परीक्षा
अभिजीत दीपके के नेतृत्व वाला आंदोलन पहले ही पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना चुका है। हाल में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने भी सरकारी विद्यालयों की बदहाली को केंद्र में ला दिया है। ऐसे में सितंबर का मार्च केवल एक प्रदर्शन नहीं रह गया है। यह उस नई राजनीतिक बेचैनी की परीक्षा बन सकता है, जिसमें युवा कह रहा है- पहले हमारी बात सुनो, वरना हम सड़क पर आकर सुनाएंगे।
शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार
यानी वीडियो में जिस बात को ‘सीजेआई ने हाथ खड़े कर दिए’ कहा गया है कि उसका अधिक सटीक अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन को पहले से अपराध या खतरा मानकर रोकने से इनकार किया है। इससे पहले भी सीजेआई कह चुके हैं कि शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार है और केवल आंदोलन करना लाठीचार्ज का आधार नहीं हो सकता।
सरकार पर बढ़ा युवाओं का दबाव
दिलचस्प बात यह है कि दूसरी तरफ केंद्र सरकार खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंची है और जंतर-मंतर सहित छात्र आंदोलनों से जुड़े कई मुकदमे खत्म करने के लिए अनुच्छेद १४२ के इस्तेमाल की मांग कर रही है। सरकार ने अदालत से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर समाप्त करने की अनुमति मांगी है। यहीं से राजनीतिक सवाल उठता है कि क्या सरकार युवाओं के बढ़ते दबाव को समझ रही है?

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