-सुधार समिति में बीजेपी नगरसेवकों की नाराजगी से खुली गठबंधन की दरार; -सवाल-मुंबई की सत्ता में ‘बड़े भाई’ की लड़ाई शुरू?
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई मनपा की सत्ता में साथ आने के बाद भाजपा और शिंदे गुट भले ही सार्वजनिक मंचों पर महायुति की मजबूती का दावा कर रहे हों, लेकिन महानगरपालिका के गलियारों से अब अलग ही कहानी निकलकर सामने आ रही है। सुधार समिति में भाजपा नगरसेवकों ने खुद को फैसलों से दूर रखने और महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर पर्याप्त चर्चा व भागीदारी नहीं मिलने की शिकायत उठाई है। आरोपों का निशाना समिति की शिंदे गुट की नेतृत्व वाली कार्यप्रणाली पर है। यानी सवाल अब केवल एक समिति की बैठक का नहीं है। क्या मनपा में सत्ता की साझेदारी शुरू होते ही महायुति का ‘हनीमून’ खत्म हो गया है?
भाजपा नगरसेवकोेंं की नाराजगी ने उस गठबंधन के भीतर की खींचतान को सार्वजनिक कर दिया है, जो चुनाव और सत्ता के समय एकजुटता का प्रदर्शन करता रहा है, लेकिन जैसे ही समितियों, प्रस्तावों और फैसलों की बारी आई, सहयोगियों के बीच अधिकारों की रस्साकशी सामने आने लगी।
‘सत्ता में हैं, लेकिन सुनवाई नहीं!’
सुधार समिति में भाजपा नगरसेवकों की शिकायत का सार यही है कि महत्वपूर्ण मामलों में उनकी बात को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जा रहा। अगर सत्तारूढ़ गठबंधन के एक प्रमुख दल के प्रतिनिधियों को ही यह शिकायत है कि उन्हें बोलने, चर्चा करने और निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त भूमिका नहीं मिल रही, तो मनपा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजनीतिक गलियारों में अब सवाल उठ रहा है कि महायुति के भीतर मनपा की सत्ता में वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में रहेगा? भाजपा अपनी राजनीतिक ताकत और संगठनात्मक प्रभाव के आधार पर बड़ी भूमिका चाहती है।
महायुति से ५ सवाल
भाजपा नगरसेवकों को फैसलों में पर्याप्त भागीदारी क्यों नहीं मिल रही?
सुधार समिति में विवाद की असली वजह क्या है?
क्या भाजपा और शिंदे गुट के बीच ‘बड़े भाई’ की लड़ाई शुरू हो गई है?
क्या समिति विवाद अन्य विभागों और समितियों तक फैलेगा?
मुंबईकरों के मुद्दों पर काम होगा या सत्ता में हिस्सेदारी की जंग चलेगी?
मनपा की राजनीति में फिलहाल तस्वीर यही है कि सत्ता की कुर्सी साझा है, लेकिन नियंत्रण की लड़ाई अलग-अलग! महायुति का ‘हनीमून’ वास्तव में खत्म हुआ है या यह केवल शुरुआती तकरार है, इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।
