तौसीफ कुरैशी
९ नवंबर २००० की वह सुबह उत्तराखंड के इतिहास में सिर्फ एक तारीख नहीं थी, बल्कि लाखों लोगों की आंखों में बसे सपनों का सूर्योदय थी। पहाड़ झूम रहे थे, लोग गा रहे थे और हर चेहरे पर एक ही भरोसा था अब हमारा राज्य होगा, हमारा शासन होगा। अब फैसले लखनऊ की फाइलों में नहीं, पहाड़ की जरूरतों के हिसाब से होंगे। अब विकास होगा, भेदभाव नहीं होगा। अब भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी। राज्य मिला। मुख्यमंत्री भी मिले। सरकारें भी मिलीं। योजनाएं भी आर्इं। घोषणाएं तो इतनी हुर्इं कि अगर उनसे स़ड़कें बनतीं, तो पहाड़ों के हर गांव तक फोरलेन पहुंच चुकी होता, लेकिन भ्रष्टाचार रूपी दीमक राज्य के प्राकृतिक सौंदर्य दृश्य को अभी भी चाट रही नहीं होती। इससे छुटकारा नहीं मिला। नित्यानंद स्वामी से शुरू हुई अपनी सरकारों की कहानी भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद्र खंडूरी, रमेश पोखरियाल निशंक, नारायण दत्त तिवारी, विजय बहुगुणा, हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और अब पुष्कर सिंह धामी तक उत्तराखंड ने मुख्यमंत्री बदलने में कोई कंजूसी नहीं की। किसी को विकास पुरुष कहा गया, किसी को व्यवहार कुशल, किसी को दूरदर्शी और किसी को भविष्य का चिंतक बताया गया, बुजुर्ग भी, मध्यम भी और युवा भी सभी श्रेणी का नेतृत्व मिला।
लेकिन एक विशेषण है, जो शायद उत्तराखंड की राजनीतिक शब्दावली में अभी तक प्रतिबंधित है `ईमानदार।’ कभी किसी सरकारी या राजनीतिक मंच पर मुख्यमंत्री के नाम के आगे ‘ईमानदार’ लिखा देखा है? या कभी किसी राजनीतिक पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में पढ़ा है ‘ईमानदार मुख्यमंत्री के नेतृत्व मों?’
कभी किसी मंच संचालक ने पूरे आत्मविश्वास से कहा ‘अब मैं आमंत्रित करता हूं हमारे ईमानदार मुख्यमंत्री को’? नहीं। क्यों नहीं? क्या इसलिए कि यह विशेषण अभी सरकारी फाइलों में स्वीकृत नहीं हुआ? या इसलिए कि नेताओं को पता है कि जनता ताली तो बहुत बातों पर बजा देती है, लेकिन ‘ईमानदार’ शब्द सुनकर सवाल पूछने लगती है? उत्तराखंड क्रांति दल की मुख्य प्रवक्ता मीनाक्षी घिल्डियाल इस सवाल को और सीधा करती हैं। उनका कहना है कि राज्य बनने के बाद कांग्रेस और भाजपा के हजारों कार्यक्रम हुए। पोस्टर लगे, बैनर लगे, होर्डिंग लगे। जनता को लुभाने के लिए बड़े-बड़े नारे लिखे गए। लेकिन किसी दल में इतना साहस नहीं हुआ कि अपने मुख्यमंत्री के नाम के आगे ‘ईमानदार’ लिख दे। अब यह बात किसी विपक्षी दल का आरोप भर नहीं है, बल्कि राजनीति के आत्मविश्वास पर सवाल है। जो नेता स्वयं अपने बारे में यह दावा करने का साहस न जुटा सके, उससे ईमानदार व्यवस्था की उम्मीद आखिर कितनी जायज? अलग राज्य का सपना केवल राजधानी बदलने का सपना नहीं था। लखनऊ से देहरादून तक सत्ता की कुर्सी खिसका देने का नाम उत्तराखंड आंदोलन नहीं था। जनता चाहती थी कि व्यवस्था बदले, फैसलों की नीयत बदले और शासन का चरित्र बदले। लेकिन वर्षों बाद भी पलायन जारी है, गांव खाली हो रहे हैं और चुनाव आते ही घोषणाओं की नई फसल उग आती है। कुछ योजनाएं लागू होती हैं, कुछ फाइलों में सो जाती हैं और कुछ चुनाव खत्म होते ही ‘जुमला’ शब्द की शरण में चली जाती हैं। सवाल यह नहीं कि किसने कितनी घोषणाएं कीं। असली सवाल यह है कि जिस ईमानदार व्यवस्था के सपने ने उत्तराखंड आंदोलन को ताकत दी थी, वह व्यवस्था आखिर कहां है? राज्य को मुख्यमंत्री मिलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, चेहरे बदलते रहे। उत्तराखंड की जनता को एक पोस्टर का इंतजार है, जिस पर बिना हिचक लिखा हो ‘ईमानदार मुख्यमंत्री के नेतृत्व में’ जिस दिन यह लिखने का साहस सत्ता में आ जाएगा, उसी दिन उत्तराखंड राज्य निर्माण का सपना सचमुच पूरा होने की दिशा में पहला कदम रखेगा। आगे भी सरकारें और मुख्यमंत्री मिलते ही रहेंगे पर क्या राज्यवासियों का `ईमानदार’ व्यवस्था का सपना साकार होगा या बस सपना था, सपना है और सपना ही रहेगा, सपने का क्या? सत्यमेव जयते..!
