प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक गजब सांचे में ढले हुए व्यक्तित्व हैं। मोदी को ‘बाबरा’ के देश में घूमते हुए यह एहसास हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था की घुड़दौड़ शुरू हो गई है। देश की जीडीपी ७.८ प्रतिशत बढ़ गई। मोदी की यह गप्पबाजी गजब ही है। रिजर्व बैंक के अनुमान से भी ज्यादा तेज गति से देश की अर्थव्यवस्था दौड़ रही है, ऐसा स्वप्न मोदी दिखा रहे हैं। भारत एक बार फिर जीत गया है, ऐसी हुंकार मोदी ने एक ‘रील’ के जरिए भरी। गौतम अडानी पैसों की दौड़ में जीते तो भारत जीत गया, शायद उन्हें ऐसा ही लगता है। जिस देश में ८५ करोड़ जनता मोदी द्वारा फेंके गए १० किलो मुफ्त अनाज पर जीती है, उस देश की ‘जीडीपी’ बढ़ी, गिरी या मर गई, इसका क्या मतलब रह जाता है? देश में सालभर में सात हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की, क्या इसे अर्थव्यवस्था की घुड़दौड़ की तस्वीर कहा जाए? महाराष्ट्र जैसे राज्य में ‘ठेकेदार’ मंडली के ९० हजार करोड़ के बिल बकाया हैं और इसके कारण अब तक १७ ठेकेदारों ने आत्महत्या कर ली है। इसका मतलब है कि राज्य के खजाने में कंगाली है, लेकिन ‘पीएम केयर’ फंड में १० हजार करोड़ रुपए यूं ही पड़े हैं। इस पैसे का उपयोग गरीबों के कल्याण के लिए हो, ऐसा मोदी को क्यों नहीं लगता? इस दौरान गौतम अडानी जैसे लोगों की संपत्ति की ‘दौड़’ बढ़ गई। विपक्षी दलों के
विधायक-सांसदों के भाव
५० करोड़ से बढ़ाकर ७५-१०० करोड़ कर दिए गए। मतलब ‘महंगाई’ बढ़ी और उस पर मोदी-शाह ‘उतारा’ दे रहे हैं, लेकिन आम लोगों की तकलीफ का क्या? देश में महंगाई की आग लगी हुई है और मोदी विदेश से सेल्फी वीडियो के जरिए भारत की ‘प्रगति’ होने की गप्प मार रहे हैं। देश में त्योहारों के दिनों में चीनी की भारी दर वृद्धि ने आम लोगों का मुंह कड़वा कर दिया है। इस आग में १ सितंबर से चौतरफा दर वृद्धि का तेल डाल दिया गया है। उस पर ‘रील’ स्टार मोदी ने मुंह नहीं खोला है, लेकिन जीडीपी वृद्धि दर ७.८ प्रतिशत दर्ज की गई, इसका ढिंढोरा वे जरूर पीट रहे हैं। उसके लिए उन्होंने देशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। मोदी को कागज पर जीडीपी के आंकड़ों का गुमान है, लेकिन रोजाना की दर वृद्धि के आंकड़ों से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। प्रगति का श्रेय वे ले रहे हैं, लेकिन महंगाई रोकने में आई नाकामी की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं हैं। गणपति के आगमन में दो हफ्ते बाकी हैं और शक्कर-गुड़ से लेकर दूध-सब्जियों तक, अनाज से लेकर र्इंधन तक हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं। शक्कर सस्ती होने के सरकारी दावे झूठे साबित हुए हैं। गुड़ की कीमत २५ प्रतिशत बढ़ गई है। प्याज ५० रुपए पर पहुंच गया है। मुंबई में १ सितंबर से दूध सीधे ९-१० रुपए प्रति लीटर महंगा हो गया है। सीएनजी महंगा हो गया है। घरेलू पीएनजी
गैस के दाम में
एक रुपए की बढ़ोतरी हुई है। सीएनजी, पेट्रोल-डीजल महंगा होने से रिक्शा-टैक्सी के किराए में बढ़ोतरी हुई है। महंगाई से अब साधारण कटिंग चाय की तलब पूरी करने के लिए गरीबों को १३ रुपए चुकाने पड़ेंगे। कृषि क्षेत्र की वृद्धि ४.४ प्रतिशत से घटकर ३.६ प्रतिशत पर आ गई है। एक महीने तक बारिश गायब रहने से किसान के खरीफ सीजन पर संकट के बादल छा गए हैं। दुनिया संकट में है फिर भी भारत ने तेज प्रगति की नई ऊंचाई हासिल की है, ऐसे ढोल विदेश से सेल्फी वीडियो के जरिए पीटने वाले ‘रील’ स्टार मोदी को रोज बढ़ती महंगाई की नई ऊंचाई नहीं दिखती। जीडीपी वृद्धि के ७.८ प्रतिशत के आंकड़े से वे फूले नहीं समा रहे, लेकिन सितंबर के पहले ही दिन चौतरफा दर वृद्धि के आंकड़ों ने आम आदमी का जीना और मुश्किल कर दिया है। दाल-चावल से लेकर त्योहारों की पूरनपोली-मोदक तक सब कुछ उनकी पहुंच से बाहर हो गया है, इसका उन्हें दुख नहीं है। लगातार गिरते रुपए और बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े उन्हें बेचैन नहीं करते। अगर देश सच में प्रगति की नई ऊंचाई छू रहा है, तो ८५ करोड़ लोगों को १० किलो मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है, यह सवाल भी उन्हें नहीं सूझता। देश में महंगाई, दर वृद्धि की आग लगी हुई है। उसे बुझाने के बजाय मोदी उस पर जीडीपी वृद्धि की फूंक मार रहे हैं! बहरहाल, मोदी के इस अर्थ ‘गप्पबाज’ को जनता अब भूलनेवाली नहीं है!
