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१३.३७ करोड़ नाम बाहर!… मतदाता सूची की सफाई या लोकतंत्र की सबसे बड़ी छंटनी?

देश की चुनावी व्यवस्था में मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं होती। यही वह आधार है जिस पर नागरिक का सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार टिका होता है। इसलिए जब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दौरान ३० राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से करीब १३.३७ करोड़ नाम बाहर होने की बात सामने आती है, तो इसे सामान्य संशोधन की प्रक्रिया कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह संख्या केवल बड़ी नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक दृष्टि से असाधारण है। यदि एसआईआर से पहले मौजूद मतदाताओं का करीब १४ प्रतिशत हिस्सा ड्राफ्ट सूची में नहीं दिखाई देता, तो स्वाभाविक रूप से पहला सवाल यही उठता है कि इनमें वास्तव में कितने मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट मतदाता हैं और कितने ऐसे जीवित तथा पात्र नागरिक हैं, जिनका नाम प्रक्रिया की खामियों के कारण बाहर हो गया। यहीं केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति और अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर की पहले की टिप्पणियां नए अर्थ ग्रहण करती हैं। प्रभाकर ने एसआईआर को लेकर बेहद तीखे शब्दों में कहा था कि स्थिति ऐसी बनाई जा रही है, जिसमें ‘मतदाता सरकार नहीं चुन रहा, बल्कि सरकार मतदाता चुन रही है।’ उस समय यह बयान राजनीतिक चेतावनी जैसा लगा होगा, लेकिन करोड़ों नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर होने के बाद उनके सवाल को केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज करना मुश्किल हो गया है।
सबसे चिंताजनक तस्वीर महाराष्ट्र और दिल्ली से सामने आती है। महाराष्ट्र में लगभग २.०७ करोड़ नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो पाए, जबकि दिल्ली में करीब एक-तिहाई मतदाता संख्या के बराबर कमी सामने आई। इतनी बड़ी संख्या अपने आप में चुनाव आयोग से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगती है। यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। ड्राफ्ट सूची से बाहर होना और अंतिम रूप से मताधिकार छिन जाना एक ही बात नहीं है। चुनाव आयोग ने दावा और आपत्ति की प्रक्रिया उपलब्ध कराई है, जिसके तहत पात्र व्यक्ति अपना नाम दोबारा जुड़वा सकता है। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि १३.३७ करोड़ वोट स्थायी रूप से काट दिए गए।
मगर असली सवाल यहीं समाप्त नहीं होता
क्या किसी लोकतंत्र में करोड़ों नागरिकों को बार-बार यह सिद्ध करना चाहिए कि वे वोट देने के अधिकारी हैं? क्या मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह नागरिक पर डाल दी जानी चाहिए? और अगर किसी पात्र नागरिक का नाम प्रशासनिक या तकनीकी गलती से कटता है, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

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