मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाहिंदी गजल-क्षितिज की भांति वह भी कल्पना ही है

हिंदी गजल-क्षितिज की भांति वह भी कल्पना ही है

क्षितिज की भांति वह भी कल्पना ही है
हमें तो फिर भी उसको खोजना ही है

व्यसन सारे तुम्हारे सौत हैं मेरी
तुम्हें इन सबके पीछे भागना ही है

भले रतिया बिता आना पर आ जाना
हमारा क्या हमें तो जागना ही है

तनिक सा प्रेम का आभास भर मिल जाय
किसी खूंटी पै ये मन टाँगना ही है

किसी की वासना अधिकार कहलाये
किसी की कामना को भी मनाही है

ये माया मोह मद मत्सर उड़ें कैसे
ये वे तोते हैं जिनको पालना ही है।

-(बहुभाषी शायर नवीन सी चतुर्वेदी)

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