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छोटी बात, बड़ा गुस्सा और खून आखिर कहां जा रहे हैं हमारे बच्चे?

तहकीकात : फिरोज खान
तेलंगाना में १०वीं के दो छात्रों द्वारा अपनी प्रिंसिपल को २७ बार चाकू गोदकर मार देना, सिर्फ एक हत्या नहीं है, यह हमारे समाज और परवरिश पर एक बड़ा सवाल है। १६ साल के बच्चे, जिनके हाथ में किताब होनी चाहिए थी, उनके हाथ में चाकू वैâसे आ गया? कभी सोचा है, आज का छात्र इतना उग्र क्यों हो रहा है? पहले टीचर की डांट को आशीर्वाद माना जाता था। आज वही डांट दुश्मनी बन जाती है। नलगोंडा केस में भी प्रिंसिपल ने सिर्फ अनुशासन के लिए डांटा था। बस, उसी अपमान का बदला लेने के लिए बच्चों ने यूट्यूब पर ‘सबूत मिटाकर हत्या वैâसे करें’ सर्च किया। यह सोच ही डरावनी है।
तीन बड़ी वजहें जो बच्चों को अपराधी बना रही हैं
मोबाइल और सोशल मीडिया का जहर-बच्चों के पास बिना रोक-टोक मोबाइल, शराब, बाइक और महंगे शौक। पैसों की चाहत में वे लूट और हत्या तक कर रहे हैं। वर्चुअल दुनिया में हिंसा देख-देखकर उनके लिए खून-खराबा सामान्य होता जा रहा है।
छोटी-छोटी बातों पर बड़ा रिएक्शन। ‘मुझे क्यों डांटा’ का गुस्सा। हार बर्दाश्त नहीं। न माता-पिता से बात, न टीचर से। गुस्सा अंदर ही अंदर जमा होता है और फिर विस्फोट बनकर फटता है।
हम बच्चों को मार्क्स तो दे रहे हैं, संस्कार नहीं। हम पूछते हैं ‘कितने नंबर आए?’, यह नहीं पूछते ‘दिल में क्या चल रहा है?’। स्कूल में भी काउंसलिंग नहीं, सिर्फ सिलेबस है। आज जरूरत है बच्चों को सुनने की, समझने की। उन्हें बताने की कि गुस्सा आना गलत नहीं, लेकिन गुस्से में उठाया गया कदम पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है। वरना कल हर क्लास में एक किताब नहीं, एक अपराधी बैठा मिलेगा।

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