अंदर की बात : राजन पारकर
नेपाल की तबाही के बीच नौ दिन बाद सुरंग से आई मजदूरों की आवाज ने उम्मीद जगाई है। दूसरी ओर महाराष्ट्र में डीजे को लेकर आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पर हमला लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। और सबसे दिलचस्प बात यह कि मुख्यमंत्री के शहर नागपुर में सत्तारूढ़ दल का ही एक नेता खुलेआम डीजे बजाने की घोषणा कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में अब कानाफूसी यही है। कानून सचमुच पूरे महाराष्ट्र के लिए एक है या शहर बदलते ही कानून की आवाज भी बदल जाती है?
सिस्टम को नौ दिन लगे आवाज सुनने में!
नेपाल में प्रकृति ने ऐसा कहर बरपाया कि हजारों जिंदगियां तबाह हो गर्इं और सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़, मलबा और तबाही के बीच राहत और बचाव दल जिंदगी की तलाश में जुटे हैं। लेकिन त्रिशूला नदी पर जलविद्युत परियोजना की सुरंग से नौ दिन बाद आई एक आवाज ने पूरी कहानी ही बदल दी ‘हम जिंदा हैं!’ सोचिए, नौ दिन तक अंधेरे में फंसा इंसान जिंदगी की उम्मीद पकड़े बैठा रहा और बाहर की दुनिया ने मान लिया कि शायद कोई बचा ही नहीं! पहले बचाव दल सुरंग में गया। जब कोई नहीं मिला तो अभियान ठंडा पड़ गया। लेकिन अब आवाज सुनाई दी तो मशीनें फिर गरजने लगीं, बचाव दल फिर दौड़ पड़ा और उम्मीद ने फिर सिर उठाया। यही तो आपदा की सबसे बड़ी सीख है। मलबे के नीचे दबा आदमी हार नहीं मानता, लेकिन व्यवस्था कभी-कभी जल्दी हार मान लेती है।
डीजे बंदी की आवाज!
अब आइए महाराष्ट्र की ओर यहां सवाल डीजे का है, लेकिन असली सवाल उससे कहीं बड़ा है कि क्या किसी सामाजिक मांग का जवाब मारपीट से दिया जाएगा? सामाजिक कार्यकर्ता विद्यानंद बापट डीजे बंदी की मांग उठा रहे थे। उनका कहना है कि व्यक्तिगत प्रसिद्धि नहीं, मुद्दे को महत्व मिलना चाहिए। यह बात उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों का संदर्भ देते हुए भी कही। लेकिन पुणे में उन पर हमला हो गया। हमला करने वाले व्यक्ति के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और बापट को सुरक्षा देने की बात सामने आई। अब रविवार को उनके समर्थन में मोर्चा निकालने की तैयारी की खबर है। यहां सवाल किसी व्यक्ति का समर्थन या विरोध करने का नहीं है। सवाल यह है कि लोकतंत्र में किसी मांग का उत्तर तर्क से दिया जाएगा या तमाचे से?अगर कोई डीजे बंदी चाहता है तो वह गलत हो सकता है, सही हो सकता है, उसकी मांग आपको पसंद हो सकती है या नहीं भी हो सकती। लेकिन उसके जवाब में हाथ उठाने की संस्कृति अगर बढ़ी तो कल किसी दूसरे मुद्दे पर किसी और की आवाज दबाने के लिए भी हाथ उठेगा। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि बापट अब इस आंदोलन को व्यक्तिगत अभियान के बजाय संगठनात्मक रूप देने की तैयारी में हैं। यानी एक थप्पड़ ने आंदोलन को खत्म करने के बजाय शायद उसे और संगठित कर दिया! सत्ता और समाज दोनों के लिए यह चेतावनी है। आवाज को दबाने की कोशिश कई बार आवाज को और बुलंद कर देती है।
‘डीजे बजाएंगे ही’
अब आता है इस पूरी कहानी का सबसे मजेदार, बल्कि सबसे गंभीर अध्याय! मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सांस्कृतिक तरीके से गणेशोत्सव मनाने की बात करते हैं। दूसरी ओर सोलापुर में पुलिस डीजे पर प्रतिबंध लगाती है। पुणे में डीजे बंदी को लेकर सामाजिक संघर्ष खड़ा हो जाता है। लेकिन मुख्यमंत्री के अपने शहर नागपुर में भाजपा के शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी का ऐलान सामने आता है ‘हम डीजे बजाएंगे ही!’ वाह! महाराष्ट्र में कानून एक है या गणेशोत्सव के साथ उसका वॉल्यूम भी शहर के हिसाब से बदलता है? मुंबई में एक आवाज, पुणे में दूसरी और नागपुर में तीसरी! तिवारी का सवाल भी कम दिलचस्प नहीं है। अगर मुंबई, पुणे और महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में डीजे बज रहा है तो नागपुर में क्यों नहीं? यही सवाल अगर आम नागरिक पूछे तो शायद उसके हाथ में नियम-कानून की किताब थमा दी जाए। लेकिन जब यही सवाल सत्ता के दल का नेता पूछता है तो राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी शुरू हो जाती है। चर्चा है कि भाजपा के भीतर डीजे को लेकर विचारों में अंतर दिखाई देने लगा है। कोई इसे व्यक्तिगत राय बता रहा है, कोई इसे अन्याय के खिलाफ लड़ाई कह रहा है।
