सामना संवाददाता / मथुरा
इस्कॉन (अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्णभावनामृत संघ) अयोध्या द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व अत्यंत अलौकिक भक्तिभाव, भव्यता और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। संपूर्ण मंदिर परिसर को विद्युत मालाओं तथा लखनऊ से विशेष रूप से मंगाए गए देशी-विदेशी सुगंधित पुष्पों से अलंकृत किया गया था। इस अवसर पर भगवान श्रीराधा-कृष्ण को चेन्नई के कुशल कारीगरों द्वारा निर्मित रत्नजड़ित भव्य वस्त्रों (पोशाक) से सुसज्जित किया गया।
इस्काॅन अयोध्या के गीता मनिषी देवशेखर विप्णु दास जी ने बताया की “उत्सव का शुभारंभ प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में भव्य मंगल आरती और उच्च स्वर में हुए महासंकीर्तन के साथ हुआ। पूरे दिन प्रांगण में अनवरत हरिनाम संकीर्तन की धारा बहती रही, जिसमें श्रद्धालु झूमते और नृत्य करते नजर आए। मध्यरात्रि में भगवान के प्राकट्य के पावन क्षण पर भव्य आतिशबाजी की गई।”
इस अवसर पर नगर निगम के महापौर पूर्व सांसद, जिला पंचायत अध्यक्ष सहित अनेक गणमान्य हस्तियों ने मंदिर पहुंचकर भगवान श्रीराधा-कृष्ण के दर्शन-पूजन किए और आशीर्वाद प्राप्त किया। उनके साथ हजारों की संख्या में अयोध्यावासियों ने भी कतारबद्ध होकर प्रभु के दर्शन किये।
महोत्सव के दौरान आयोजित विशेष आध्यात्मिक सत्र में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं एवं महिमा पर आधारित श्रीमद्भागवत कथा एवं दिव्य प्रवचन का आयोजन किया गया। इस दौरान गीता मनीषी देवशेखर विष्णु दास तथा षडभुज गौर दास ने अपने ओजस्वी प्रवचन से जन्माष्टमी के गूढ़ आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला और श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराया। इसके साथ ही छोटे-छोटे बाल-कलाकारों ने मनमोहक नाटक, संकीर्तन और संस्कृत श्लोकों का सुमधुर पाठ प्रस्तुत किया, जबकि अवध विश्वविद्यालय के छात्रों ने “कलियुग और उसके दुत” विषय पर एक विशेष नाटिका का मंचन कर समाज को सजग किया।
प्रवचन श्रृंखला में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए गीता मनीषी देवशेखर विष्णु दास ने समाज को संदेश दिया
“आज का मानव भौतिक साधनों की दौड़ में अपनी आत्मा की शांति खोता जा रहा है। श्रीकृष्ण का प्राकट्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हमारे अंतःकरण में ज्ञान और भक्ति के प्रकाश का उदय है। जब तक समाज श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म और शरणागति के सिद्धांतों को अपने जीवन में नहीं उतारेगा, तब तक शांति संभव नहीं है। कलियुग के प्रभावों से बचने का एकमात्र सशक्त मार्ग हरिनाम संकीर्तन और नैतिक मूल्यों का आचरण है।”
उत्सव का मुख्य आकर्षण मध्यरात्रि में आयोजित भगवान का महाअभिषेक रहा। भगवान का अभिषेक १०८ पवित्र तीर्थस्थलों से लाए गए पावन जल, पंचगव्य, दूध, दही, घृत, शहद तथा फलों के रसों से किया गया। इस दौरान वेदों के परम पावन ‘ब्रह्म संहिता’ के श्लोकों का सस्वर पाठ किया गया। अभिषेक के उपरांत प्रभु को श्रद्धालुओं द्वारा अपार श्रद्धा से निर्मित १०८ प्रकार के व्यंजनों का महाभोग अर्पित किया गया।
मध्य रात्रि ठीक १२ बजे महाआरती संपन्न हुई। इस्कॉन की ओर से प्रातःकाल से लेकर मध्यरात्रि तक मंदिर आने वाले हजारों श्रद्धालुओं एवं अयोध्यावासियों के लिए पूर्ण थाली महाप्रसाद के निःशुल्क वितरण की निरंतर व्यवस्था की गई थी। हजारों की संख्या में आए भक्तों ने प्रसाद ग्रहण कर अपने जीवन को धन्य बनाया।
