-कवरेज के दौरान दिल्ली पुलिस ने लिया हिरासत में, मारपीट के आरोप
– उमन गुप्ता
दिल्ली में दो महिला पत्रकारों के साथ कथित पुलिसिया दुर्व्यवहार के आरोप ने प्रेस की स्वतंत्रता और दिल्ली पुलिस की जवाबदेही पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्रकारों का आरोप है कि वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम की कवरेज के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से सवाल करने पहुंची थीं। इसके बाद उन्हें रोका गया और साकेत पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां उनके साथ कथित तौर पर मारपीट और दुर्व्यवहार हुआ। महिला पत्रकारों ने दावा किया कि पुलिस कार्रवाई के दौरान उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और तस्वीरों में उन्होंने चोट लगने के भी आरोप लगाए। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि आरोप केवल हिरासत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पुलिस स्टेशन के भीतर व्यवहार को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस का कहना है कि उन्हें पूछताछ के लिए थाने ले जाया गया था और मारपीट के आरोप भ्रामक हैं। अब असली सवाल आरोप और जवाबी बयान के बीच फंसा हुआ है। अगर पत्रकारों के आरोप सही हैं तो यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है और यदि पुलिस का दावा सही है तो निष्पक्ष जांच से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज, घटनास्थल की वीडियो रिकॉर्डिंग, मेडिकल रिपोर्ट और वहां मौजूद अधिकारियों के बयान इस मामले की सच्चाई तक पहुंचने के महत्वपूर्ण आधार हो सकते हैं। यही वह बिंदु है जहां दिल्ली सरकार और पुलिस की जवाबदेही तय होती है।
पत्रकार संगठनों ने जताई नाराजगी
पत्रकार संगठनों और विपक्षी दलों ने भी मामले में जांच की मांग उठाई है। अब सवाल यह है कि साकेत मामले में अब स्पष्ट जवाब चाहिए। क्या थाने और घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित हैं? क्या कथित चोटों की मेडिकल जांच हुई? क्या पूरी घटना की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? साकेत की घटना दिल्ली की पुलिस व्यवस्था के सामने एक सीधा सवाल छोड़ती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि सवाल पूछे जाएं और जवाब सबूतों के साथ दिए जाएं।
