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ईरान में फंस गया ट्रंप का अमेरिका!

-५० हजार अमेरिकी जवान, १९ युद्धपोत मध्य पूर्व में; सैन्य अफसरों ने भी जताई चिंता
-कुछ हफ्तों की जंग का दावा, अब २०२७ तक सैनिकों की तैनाती

ईरान के खिलाफ जिस सैन्य अभियान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में तेज और सीमित कार्रवाई के रूप में पेश किया था, वह अब लंबी जंग में बदलता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने मध्य पूर्व में तैनात कई सैन्य इकाइयों की तैनाती २०२७ तक बढ़ाने की तैयारी कर दी है।
रिपोर्टों के मुताबिक, इस समय मध्य पूर्व में करीब ५० हजार अमेरिकी सैनिक, १९ युद्धपोत, लड़ाकू विमान, वायु रक्षा प्रणाली और पैराट्रूपर इकाइयां तैनात हैं। अमेरिकी सेना की ८२वीं एयरबोर्न डिवीजन के कुछ जवानों की तैनाती भी अगले साल तक बढ़ा दी गई है।
यानी सवाल अब यह नहीं है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ कितने दिन कार्रवाई करेगा, बल्कि यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन एक ऐसी लंबी जंग में फंस चुका है, जिसका अंत उसे खुद भी दिखाई नहीं दे रहा।
सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी सेना के भीतर से उठ रही है। रिपोर्टों के अनुसार, कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने मध्य पूर्व में इतनी बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य संसाधन लंबे समय तक बांधे रखने पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि इससे अमेरिका की यूरोप, प्रशांत क्षेत्र और दूसरे सामरिक मोर्चों पर प्रतिक्रिया देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
यह तैनाती अमेरिकी सैनिकों पर भी भारी पड़ रही है। युद्धपोतों की समुद्री तैनाती लगातार बढ़ रही है, जवान महीनों तक घर नहीं लौट पा रहे और हथियारों तथा मिसाइलों के भंडार पर दबाव बढ़ रहा है।
ईरान युद्ध का दूसरा बड़ा असर अमेरिकी हथियार भंडार पर दिख रहा है। पैट्रियट, थाड, टॉमहॉक और दूसरी अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियों के भंडार को लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन हथियारों की पूरी भरपाई में कई वर्ष लग सकते हैं।
राजनीतिक मोर्चे पर भी ट्रंप के लिए संकट बढ़ रहा है। ईरान के साथ संघर्ष सातवें महीने में प्रवेश कर चुका है और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी इसके खत्म होने की कोई समयसीमा नहीं बता पा रहे हैं।
अब २०२७ तक सैनिकों की तैनाती बढ़ाने का पैâसला एक बड़ा संकेत दे रहा है कि वॉशिंगटन खुद भी जल्द शांति की उम्मीद नहीं कर रहा।
जिस युद्ध को कुछ सप्ताह की निर्णायक कार्रवाई बताकर शुरू किया गया था, वही अब अमेरिका के लिए सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों मोर्चों पर लंबी परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है।

 

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