-मोदी जी मेरे बड़े भाई हैं, कपिल मिश्रा मेरे बड़े भाई हैं, चिराग पासवान मेरे बड़े भाई हैं
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
देश की राजधानी में कानून का राज आखिर चलता किसके इशारे पर है? पुलिस का डंडा आम प्रदर्शनकारी पर टूटता है या कानून तोड़ने का दावा करने वाला व्यक्ति राजनीतिक रसूख का नाम लेकर खुलेआम घूम सकता है? जंतर-मंतर हिंसा से जुड़े स्वतंत्र भारद्वाज का वायरल पॉडकास्ट इन्हीं असहज सवालों को देश के सामने खड़ा कर रहा है।
पॉडकास्ट में स्वतंत्र भारद्वाज कथित तौर पर बेखौफ अंदाज में कहता सुनाई देता है, ‘निशु के बाप का हम सिर फाड़े हैं।’ इतना ही नहीं, वह दावा करता है कि घायल व्यक्ति के सिर पर ६० टांके लगे, मामला हत्या के प्रयास जैसा गंभीर हो सकता था, लेकिन वह जेल तक नहीं गया। इसके बाद वह अपने राजनीतिक संपर्कों का बखान करते हुए कपिल मिश्रा, चिराग पासवान और यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपना ‘बड़ा भाई’ बताता है।
जंतर-मंतर के गुंडे स्वतंत्र भारद्वाज ने खुद खोली पॉडकास्ट में पोल
सवाल सिर्फ स्वतंत्र भारद्वाज के आचरण का नहीं रह जाता। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसके सिर पर देश की राजधानी की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी है। यदि कोई व्यक्ति वैâमरे के सामने बैठकर किसी नागरिक का सिर फोड़ने का दावा करे, अपने राजनीतिक संपर्कों का नाम ले और यह भी बताए कि वह जेल नहीं गया, तो गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है, इस बयान के बाद जांच किस दिशा में जा रही है? क्या कथित राजनीतिक फोन कॉल की जांच होगी? जिन नेताओं के नाम लिए गए, उनसे स्पष्टीकरण मांगा जाएगा या नहीं?
पुलिस की सफाई से पैदा हुआ नया सवाल
वायरल वीडियो में स्वतंत्र भारद्वाज का एक और दावा कम चौंकाने वाला नहीं है। वह कथित तौर पर पुलिस जैसी जूती और लाठी का जिक्र करते हुए कहता है कि वह बिना किसी औपचारिकता के पुलिस जैसी चीजों के साथ घूमता है। अगर यह केवल डींग है तो भी पुलिस के नाम और प्रतीकों का ऐसा सार्वजनिक इस्तेमाल जांच का विषय बनता है; और यदि इसके पीछे कोई वास्तविक पहुंच है तो मामला और गंभीर हो जाता है।
दिल्ली पुलिस ने हालांकि भारद्वाज के सनसनीखेज दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की है। पुलिस का कहना है कि २३ जून को जंतर-मंतर पर संजय कुमार को लगी चोट साधारण प्रकृति की थी और मेडिकल रिपोर्ट में खोपड़ी फटने की पुष्टि नहीं हुई।
आरोपी की जुबान बनाम पुलिस की मेडिकल रिपोर्ट
एक तरफ भारद्वाज कथित तौर पर ‘सिर फोड़ने’ और गंभीर चोट का दावा करता है, दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर चोट को साधारण बताती है। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा विरोधाभास है। अब जांच एजेंसियों पर जिम्मेदारी है कि दोनों दावों के बीच सच क्या है, वह सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करें।
जंतर-मंतर पर घूम रहे थे ऐसे अनेकों स्वतंत्र भारद्वाज
जंतर-मंतर पर हुई झड़प को केवल स्वतंत्र भारद्वाज तक सीमित करके देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। आंदोलन स्थल पर उस दिन ऐसे कई लोग सक्रिय बताए गए, जो प्रदर्शनकारियों से उलझ रहे थे, धक्का-मुक्की कर रहे थे और माहौल को उग्र बना रहे थे। वायरल वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसे लोगों की पहचान कितनी हुई और कितनों के खिलाफ कार्रवाई की गई? यदि स्वतंत्र भारद्वाज आज पॉडकास्ट में कथित तौर पर अपनी दबंगई और राजनीतिक पहुंच का बखान कर रहा है, तो क्या वह अकेला था? जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बाकी संदिग्ध लोगों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि कानून की नजर केवल कुछ चेहरों तक सीमित रही और बाकी लोग भीड़ में गुम होकर निकल गए? अब जरूरत केवल एक आरोपी की जांच की नहीं, बल्कि उस पूरे नेटवर्क और उन सभी लोगों की पहचान की है जो प्रदर्शन के दौरान हिंसा, उकसावे या डर का माहौल बनाने में शामिल रहे हों।
अगर सब झूठ है तो भारद्वाज से पूछताछ क्यों नहीं?
स्वतंत्र भारद्वाज अगर पॉडकास्ट में झूठी शेखी बघार रहा है तो सवाल यह है कि पुलिस ने उसके इन कथित बयानों पर अलग से क्या कार्रवाई की? किसी व्यक्ति का वैâमरे के सामने बैठकर सिर फोड़ने, राजनीतिक पहुंच और जेल न जाने का दावा करना सामान्य बात नहीं है। पुलिस यदि इन दावों को गलत मानती है तो उनसे पूछताछ कर सच सामने लाना उसकी जिम्मेदारी बनती है।
फोन किसका आया था, अब यही सबसे बड़ा सवाल
भारद्वाज ने कथित तौर पर राजनीतिक संपर्कों और नेताओं के नाम लेकर यह संकेत दिया कि उसे संरक्षण मिला। दिल्ली पुलिस राजनीतिक हस्तक्षेप से इनकार कर चुकी है। ऐसे में सबसे सीधा सवाल है, क्या घटना के बाद किसी नेता, कार्यकर्ता या प्रभावशाली व्यक्ति ने पुलिस से संपर्क किया था? अगर नहीं, तो भारद्वाज यह दावा किस आधार पर कर रहा है?
मोदी, कपिल मिश्रा,
चिराग का नाम लेकर दबंगई का प्रदर्शन?
पॉडकास्ट में भारद्वाज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कपिल मिश्रा और चिराग पासवान को कथित तौर पर अपना ‘बड़ा भाई’ बताता नजर आता है। इन नेताओं का किसी गैरकानूनी संरक्षण से संबंध साबित नहीं हुआ है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर आरोपी उनके नाम का इस्तेमाल किस मकसद से कर रहा था? क्या यह राजनीतिक रसूख दिखाकर डर पैदा करने की कोशिश थी?
