साहित्य शलाका : प्रो. दयानंद तिवारी
आज का समय केवल विचारों का नहीं, बल्कि विचार गढ़ने का समय है। बाजार हमारी आवश्यकताएं गढ़ रहा है, सोशल मीडिया हमारी पसंद और धारणाएं गढ़ रहा है, एल्गोरिद्म यह निर्धारित कर रहे हैं कि हमें क्या दिखाई दे और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब भाषा, चित्र और विचारों की संरचना तक में सहभागी हो चुकी है। ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं कि सोच गढ़ी जा रही है या नहीं; असली प्रश्न है यह कि हमारी सोच का निर्माता कौन है। हमारा अपना विवेक या हमारे चारों ओर सक्रिय अदृश्य प्रभाव? यहीं साहित्य का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है।
ऋग्वेद का सूत्र है-
‘आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:।’
अर्थात्, सभी दिशाओं से हमारे पास
कल्याणकारी विचार आएं।
भारतीय चिंतन की यह उदारता आज के डिजिटल युग में अत्यंत प्रासंगिक है। खिड़कियां संसार की ओर खुली हों, लेकिन विवेक का द्वार इतना कमजोर न हो कि हर बहती हवा हमें अपनी दिशा में ले जाए। साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह मनुष्य को केवल क्या सोचना है नहीं बताता, बल्कि वैâसे सोचना है, इसका संस्कार देता है।
महाराष्ट्र की भूमि इस दृष्टि से विशेष रूप से समृद्ध रही है। संत ज्ञानेश्वर ने अध्यात्म को लोकभाषा और लोकचेतना से जोड़ा, संत तुकाराम ने भक्ति के भीतर सामाजिक संवेदना और मनुष्य की आत्मिक समानता का स्वर मुखर किया। महात्मा ज्योतिबा फुले ने लेखन को सामाजिक प्रश्नों से जोड़ा और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने ज्ञान, तर्क और शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रबल माध्यम बनाया। इसलिए महाराष्ट्र में साहित्य केवल सौंदर्य का विषय नहीं रहा; वह समाज से प्रश्न करने, अन्याय को पहचानने और मनुष्य को अधिक जागरूक बनाने की परंपरा भी रहा है। यही परंपरा आज नए संदर्भ में हमारे सामने खड़ी है।
साहित्य और गणित पहली दृष्टि में दो अलग संसार लगते हैं। गणित निश्चित उत्तर चाहता है, साहित्य अनेक संभावनाएं खोलता है। गणित संख्याओं के बीच संबंध खोजता है, साहित्य मनुष्यों के बीच। लेकिन दोनों का मूल स्वभाव एक है वह है अव्यवस्था में अर्थ तलाशना।
जीवन को एक समीकरण की तरह देखें तो कहना चाहिए कि –
प्रेम जोड़ता है,
अहंकार घटाता है,
सहयोग गुणा करता है
और विभाजन मनुष्यता को बांट देता है।
गणित कह सकता है कि दो और दो चार होते हैं; साहित्य यह पूछता है कि उन चार मनुष्यों में किसके हिस्से कितना सुख आया और किसके हिस्से कितना संघर्ष।
इसीलिए नई पीढ़ी को गणित की तार्किकता और साहित्य की संवेदना दोनों चाहिए।
हम इसे एक आधुनिक सूत्र में भी समझ सकते हैं जैसे-
सूचना + परीक्षण ृ ज्ञान
ज्ञान + अनुभव ृ विवेक
विवेक + संवेदना ृ प्रज्ञा
और प्रज्ञा + कर्म ृ परिवर्तन।
आज हमारी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सूचना असंख्य हैं, लेकिन मनन सीमित होता जा रहा है। कुछ सेकंड की वीडियो, आधी-अधूरी खबर या वायरल वाक्य किसी व्यक्ति, संस्था और कभी-कभी पूरे समाज के बारे में हमारी धारणा तय कर देता है।
इसीलिए यह याद रखना आवश्यक है कि लोकप्रियता सत्य का प्रमाण नहीं है।
‘युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि’-तर्कयुक्त और उचित बात छोटे से छोटे व्यक्ति से भी मिले तो उसे स्वीकार करना चाहिए। यह सूत्र हमें बताता है कि विचार की प्रतिष्ठा उसके स्रोत से नहीं, उसकी सत्यता और उपयोगिता से होती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में साहित्य का प्रश्न और गहरा हो गया है। मशीन हजारों शब्दों में कविता लिख सकती है, कहानी बना सकती है, सूचना का सार दे सकती है; लेकिन मनुष्य की पीड़ा को जी नहीं सकती। वह मां पर लेख लिख सकती है, मगर मां की स्मृति अनुभव नहीं कर सकती; विरह पर कविता बना सकती है, लेकिन विरह की रात नहीं काट सकती। यहीं मानवीय संवेदना साहित्य की अंतिम पहचान बनती है। आज के समय पर कुछ पंक्तियां इस तरह कही जा सकती हैं-
स्क्रीन उजली होती गई, मन का आंगन धुंधला है,
शब्दों का संसार बड़ा, संवाद मगर कुछ पतला है।
अंकों में हमने जग मापा, मन का माप कहां होगा,
संवेदना यदि शून्य हुई तो मनुष्य कहां खड़ा होगा?
युवा पीढ़ी को इसलिए चार बातें याद रखनी होंगी। पढ़िए, पर प्रश्न भी कीजिए; आधुनिक बनिए, पर अपनी जड़ों को जानिए; तकनीक अपनाइए, पर उसके अधीन मत होइए; असहमति रखिए, पर संवाद कभी मत छोड़िए।
क्योंकि साहित्य की गढ़ी हुई सोच तब खतरनाक होती है जब वह हमें सोचने से रोकती है, और वही सोच सृजनात्मक बन जाती है जब वह हमें वर्तमान से बेहतर भविष्य की कल्पना करने की शक्ति देती है।
अंतत: भविष्य केवल अधिक तेज मशीनों का नहीं होगा। भविष्य उन मनुष्यों का होगा जिनके भीतर विज्ञान की जिज्ञासा, गणित का तर्क, साहित्य की संवेदना, महाराष्ट्र की समृद्ध वैचारिक परंपरा और स्वतंत्र चिंतन का साहस एक साथ जीवित रहेगा।
तकनीक हमें गति दे सकती है,
गणित हमें तर्क दे सकता है,
पर साहित्य ही हमें यह याद दिलाता है कि इस गति और शक्ति के बीच मनुष्य को मनुष्य वैâसे बनाए रखना है।
यही आज के साहित्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और शायद ‘गढ़ी हुई सोच’ का सबसे सुंदर रूप भी-ऐसी सोच, जो समाज को बांधे नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विवेक, संवेदना और स्वतंत्रता का नया प्रकाश जगाए।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
