-अब सवाल- दोस्ती बढ़ी या सिर्फ फोटो खिंची?
नई दिल्ली। ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने कूटनीति की पूरी थाली सजा दी- द्विपक्षीय वार्ताएं, गर्मजोशी, समूह फोटो, बड़े बयान और आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भव्य रात्रिभोज। लेकिन इस पूरी मेजबानी में एक कुर्सी ऐसी रही, जिसने बाकी तमाम तस्वीरों पर भारी पड़ने का काम किया- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खाली कुर्सी।
जिनपिंग दिनभर सम्मेलन में मौजूद रहे, प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात भी की, रिश्तों को संभालने और आगे बढ़ाने की बातें भी हुई । मगर रात का डिनर आया तो चीनी राष्ट्रपति होटल लौट गए। कारण बताया गया- आराम। अब कूटनीति में आराम भी कितना ‘आराम’ होता है और कितना ‘संकेत’, यह विदेश मंत्रालय के शब्दकोश से ज्यादा नेताओं की बॉडी लैंग्वेज तय करती है।
उनका गायब होना आश्चर्यजनक
भारत के लिए यह यात्रा खास थी। वर्षों बाद जिनपिंग दिल्ली आए थे, इसलिए सरकार इसे संबंधों में नई गर्माहट के तौर पर पेश करना चाहती थी। लेकिन जिस डिनर को अनौपचारिक निकटता का मौका माना जाता है, उसी से उनका गायब होना कहानी में एक बड़ा अल्पविराम छोड़ गया।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
सरकार कह सकती है कि औपचारिक बैठक ज्यादा महत्वपूर्ण थी, डिनर नहीं। यह बात सही भी है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में वही चीजें ज्यादा चर्चा बटोरती हैं, जिन्हें आधिकारिक बयान नजरअंदाज कर देते हैं। तो सवाल यही है- अगर रिश्तों की बर्फ पिघल रही थी, तो डिनर की मेज इतनी ठंडी क्यों रह गई?
अभी ‘ऑल इज वेल’ नहीं
‘ब्रिक्स’ में भारत ने मेजबानी का पूरा दम दिखाया, लेकिन जिनपिंग की अनुपस्थिति ने यह याद दिला दिया कि चीन के साथ रिश्ते अभी ‘ऑल इज वेल’ की स्थिति से काफी दूर हैं। कूटनीति की मेज सजी जरूर, मगर सबसे चर्चित प्लेट वही रही, जिसे जिनपिंग ने छुआ ही नहीं।
