मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : राष्ट्रीय सेठ के कारोबार का नया गलियारा!

दिल्ली लाइव : राष्ट्रीय सेठ के कारोबार का नया गलियारा!

-अरूण कुमार गुप्ता
राष्ट्रीय सेठ यानी उद्योगपति गौतम अडानी की दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति से मुलाकात को महज कारोबारी शिष्टाचार मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अप्रâीका के बंदरगाहों, ऊर्जा, खनन और बुनियादी ढांचे में बढ़ती कारोबारी दिलचस्पी के बीच यह मुलाकात भारत के बड़े कॉरपोरेट समूहों की वैश्विक विस्तार रणनीति पर सवाल खड़े करती है। ब्रिक्स अब केवल कूटनीतिक मंच नहीं रह गया है, बल्कि ब्रिक्स कारोबार का नया गलियारा बन गया है। वह भी राष्ट्रीय सेठ के लिए। इसी को तो कहते हैं दोस्ती निभानी। क्योंकि मोदी जो हैं तो मुमकिन वैसे नहीं होगा। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा और गौतम अडानी की दिल्ली में मुलाकात १८वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान हुई। दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, यह बैठक भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच वाणिज्यिक तथा निवेश संबंधों को मजबूत करने के प्रयासों का हिस्सा थी। अफ्रीका दुनिया के महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों का केंद्र है। ऊर्जा संक्रमण, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के बदलते समीकरणों के बीच वहां के संसाधनों का रणनीतिक महत्व बढ़ रहा है। दक्षिण अफ्रीका के साथ कारोबारी रिश्ते मजबूत करना भारतीय कंपनियों के लिए इन अवसरों तक पहुंच बनाने का एक रास्ता हो सकता है। हालांकि, अडानी समूह ने इस मुलाकात के बाद दक्षिण अफ्रीका में किसी नई परियोजना, निवेश राशि या अधिग्रहण की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन भविष्य में इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है। क्योंकि रामाफोसा और अडानी की मुलाकात समय बर्बाद करने के लिए तो थी नहीं।

आतंकवाद पर कूटनीति का पर्दा?
आतंकवाद के खिलाफ पूरी दुनिया को एकजुट होने का संदेश देने वाले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठते हैं, तब कुछ देश कूटनीतिक शब्दों की आड़ में असली मुद्दे से बच निकलते हैं। ब्रिक्स के मंच पर मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम का रुख भी इसी बहस को जन्म देता है। बता दें कि मलेशिया के प्रधानमंत्री ने पहलगाम हमले को लेकर पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक देश कहने से इनकार कर दिया। सवाल यह है कि आतंकवाद की पीड़ा झेलने वाले देशों की चिंता बड़ी है या पाकिस्तान के साथ राजनीतिक समीकरण? भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा देने और आतंकी संगठनों को संरक्षण देने के आरोप लगाता रहा है। नई दिल्ली का स्पष्ट मत है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हमलावरों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक संरक्षण देने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई देश आतंकवाद की निंदा तो करते हैं, लेकिन उसके प्रायोजकों का नाम लेने से बचते हैं। यही रवैया आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को कमजोर करता है। पाकिस्तान पर आरोपों के बीच उसका कूटनीतिक तंत्र लगातार यह कोशिश करता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे को भारत-पाकिस्तान विवाद के व्यापक संदर्भ में देखा जाए। भारत के लिए यह केवल बयानबाजी का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के पीड़ितों के न्याय का सवाल है। मलेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया का महत्वपूर्ण देश है और भारत के साथ उसके रणनीतिक संबंध भी हैं। ऐसे में आतंकवाद के मुद्दे पर उसका रुख विशेष महत्व रखता है। यदि किसी मंच पर पाकिस्तान को लेकर स्पष्ट सवाल उठते हैं, तो उससे बचने के बजाय पारदर्शी और सिद्धांत आधारित जवाब अपेक्षित है।

 

 

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