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इस्लाम की बात : मक्का समझौते की अग्निपरीक्षा

-सैयद सलमान 
पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े-बड़े समझौतों की असल अहमियत संकट के समय ही सामने आती है। यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब की बढ़ती मुश्किलें, पवित्र शाहर मक्का की सुरक्षा को लेकर पैदा हुई चिंताएं और क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रियाएं एक बड़े सवाल की ओर इशारा कर रही हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ आखिर कितना कारगर साबित हो रहा है?
पाकिस्तानी की बकैती!
पहले सऊदी अरब ने दावा किया कि हूतियों की ओर से मक्का की दिशा में भेजे गए एक ड्रोन को उसके हवाई रक्षा तंत्र ने रोक दिया। फिर हूतियों ने मक्का पर हमले के आरोप से इनकार किया। इसके बाद रियाद की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को भी रोकने की जानकारी सामने आई। उसके बाद हूती हमले रियाद सहित अन्य ठिकानों पर बढ़ते गए। इस से सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता बढ़ गई। अब सवाल केवल सैन्य ठिकानों की हिफाजत का न होकर नागरिकों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और क्षेत्रीय स्थिरता का भी हो गया।
ऐसे में मक्का समझौते की चर्चा स्वाभाविक है। इसकी मूल भावना है कि किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला बाकी साझेदारों की सुरक्षा से भी जुड़ा मामला माना जाएगा। लेकिन सामूहिक रक्षा का वादा अपने आप में तत्काल संयुक्त सैन्य कार्रवाई की गारंटी नहीं होता। तिस पर अगर समझौते में पाकिस्तान जैसा गैर-भरोसेमंद देश शामिल हो। प्रतिक्रिया समझौते की शर्तों, हमले की प्रकृति और सदस्य देशों के राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करती है।
गौरतलब है की अगस्त माह के आखिर में तीनों देशों के प्रतिनिधियों की इस्तांबुल में हुई बैठक में सहयोग को संस्थागत बनाने, सचिवालय स्थापित करने और रक्षा उद्योग तथा सैन्य तकनीक में साझेदारी बढ़ाने पर सहमति बनी थी। यह महत्वपूर्ण पहल तो थी, लेकिन कूटनीतिक सहमति और वास्तविक सैन्य तैयारी के बीच अंतर होता है। मौजूदा संकट इसी अंतर की तरफ इशारा करता है।
तुर्किये और पाकिस्तान की हालिया प्रतिक्रियाएं भी महत्वपूर्ण हैं। तुर्किये ने कहा है कि वह जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब को सैन्य और तकनीकी सहायता देने के लिए तैयार है। पाकिस्तान ने भी संकेत दिया कि हूती हमलों के मद्देनजर समझौते को सक्रिय करने का समय आ सकता है। इन बयानों से सहयोग की इच्छा तो जाहिर होती है, लेकिन असल सवाल यह है कि जरूरत पड़ने पर सहायता किस रूप में और कितनी जल्दी उपलब्ध होगी।
सुरक्षा की गारंटी
पाकिस्तान के सामने इस मामले में कठिन कूटनीतिक चुनौती है। सऊदी अरब उसके पुराने सहयोगियों में है और दोनों देशों के आर्थिक तथा रक्षा संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान उसका पड़ोसी है और हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त माना जाता है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब के प्रति प्रतिबद्धता निभाने और ईरान के साथ संबंध संतुलित रखने के बीच रास्ता निकालना आसान नहीं होगा। प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप उसे व्यापक संघर्ष में खींच सकता है, जबकि जरूरत के समय पीछे हटना उसकी सामरिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है।
२२ सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक में सऊदी अरब के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया गया। साथ ही तनाव कम करने, समुद्री आवाजाही सुरक्षित रखने और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया गया। इससे स्पष्ट है कि क्षेत्रीय इस्लामिक देश सैन्य सुरक्षा के साथ संघर्ष को फैलने से रोकने की जरूरत भी महसूस कर रहे हैं।
सऊदी अरब के सामने अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की चुनौती है। ड्रोन और मिसाइल हमलों से निपटने के लिए आधुनिक हवाई रक्षा प्रणाली, बेहतर खुफिया सहयोग और तकनीकी क्षमता जरूरी है। ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी संदर्भ में इजरायल के साथ संभावित सुरक्षा सहयोग की चर्चाएं उठ सकती हैं। हालांकि, समान सुरक्षा चिंताओं का अर्थ औपचारिक साझेदारी तय होना नहीं है। फिलिस्तीन का मुद्दा और क्षेत्रीय राजनीति किसी भी नए समीकरण को जरूर प्रभावित करेंगे।
मक्का समझौते की असल परीक्षा उसके क्रियान्वयन में है। धार्मिक निकटता, साझा पहचान और पुराने रिश्ते सहयोग की जमीन तैयार कर सकते हैं, लेकिन सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकते। इसके लिए स्पष्ट प्रतिबद्धताएं, सैन्य तालमेल और संकट के समय फैसले लेने की वास्तविक क्षमता जरूरी है।
पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट से पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में घोषणाओं से अधिक महत्व उनके जमीन पर उतरने का होता है। दोस्ती और साझेदारी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंतत: हर देश अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही कदम उठाता है। मक्का समझौते का भविष्य भी इसी यथार्थ से तय होगा।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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