सूखे के भीषण थपेड़ों ने मराठवाड़ा सहित महाराष्ट्र के अनेक हिस्सों में हाहाकार मचा दिया है। अमूमन मराठवाड़ा और विदर्भ गर्मियों में सूखे के थपेड़े सहते हैं; लेकिन इस साल ऐन बारिश के दिनों में ही सूखे की मार पड़ी है। यह पहली दफा है कि देश व महाराष्ट्र को बारिश के मौसम में ही सूखे का सामना करना प़ड़ रहा है। यह सूखा कोई मामूली सूखा नहीं है। मानसून शुरू होते ही इस साल बारिश ने `अल नीनो’ का भयानक असर दिखाया। पूरा मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र का सोलापुर, अहिल्यानगर सहित अनेक जिले और पश्चिमी विदर्भ के अनेक जिलों में बेहद कम बारिश हुई। कुछ जिलों में डेढ़ महीने तो कहीं दो महीनों में बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी। इस वजह से आधे से ज्यादा महाराष्ट्र के खेतों की पूरी फसलें जल गर्इं। बुआई से लेकर खाद-पानी, निराई-गुड़ाई वगैरह पर किसानों द्वारा किया गया पूरा खर्च बेकार चला गया। सोयाबीन, कपास, अरहर, मूंग, उड़द, ज्वार, मक्का इत्यादि सभी फसलों की बढ़त रुक गई और वे मौके पर ही झुलस गर्इं। गांव-देहात के जिन किसानों के पास कुएं या सिंचाई की सुविधा है, ऐसे इक्का-दुक्का किसानों ने उपलब्ध पानी पर जैसे-तैसे फसलें थोड़ी-बहुत बचा लीं। हालांकि, इन किसानों का उत्पादन भी ५० से ७० प्रतिशत कम होगा, ऐसा मंजर गांव-गांव दिख रहा है। असिंचित भूमि वाले किसानों की संख्या तो अधिक है और उनकी तो सौ प्रतिशत फसल हाथ से निकल चुकी है। अमूमन सितंबर महीने में ग्रामीण इलाकों में हर तरफ हरी फसलें लहलहाती दिखती हैं। इस साल खेतों ने ऐसी हरी चादर ओढ़ी ही नहीं। बुआई के बाद बमुश्किल महीना भर हरे-भरे रहे खेत अगस्त के पहले हफ्ते से ही पीले पड़ने लगे। महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों से सोयाबीन की फसल सबसे ज्यादा ली जाती है, लेकिन बारिश के पहले महीने में ही
सूखे का संकट
हावी हो गया। सोयाबीन ने घुटने टेक दिए। कई जिलों में सोयाबीन में फूल तक नहीं आए। फूल लगे, तो फलियां नहीं और फलियां लगीं तो अंदर सोयाबीन के दाने ही नहीं हैं। पिछले सौ-दो सौ सालों के इतिहास में सूखे का ऐसा संकट किसानों ने नहीं देखा है। गीला सूखा हो तो खरीफ चली भी जाए, तब भी किसान हिम्मत नहीं हारता। वह तुरंत रबी की तैयारी में जुट जाता है, लेकिन इस साल कुएं, तालाब, जलाशय, बोरवेल सब कुछ बारिश के मौसम में ही सूख जाने से रबी की बुआई भी नहीं हो सकेगी। फसलों के दोनों मौसम हाथ से निकल जाने पर किसान जिएं तो वैâसे जिएं, यह सबसे बड़ा सवाल है। महाराष्ट्र जैसी ही स्थिति पड़ोसी कर्नाटक राज्य में भी है, लेकिन वहां एक हफ्ते पहले ही कर्नाटक सरकार ने सूखा घोषित कर दिया। राहत कार्य भी शुरू हो गए। हमारे यहां तो मुख्यमंत्री अभी भी सूखा घोषित करने की तारीखों के मुहूर्त निकालने में ही उलझे हुए हैं। अब जाकर मुख्यमंत्री और सरकार के मंत्री किसानों की बदहाली का तांडव देखने के लिए लश्कर-पश्कर लेकर मेड़ पर पहुंचे हैं। दरअसल, सूखे की स्थिति इतनी भयानक है कि बिना कोई पंचनामा, सर्वेक्षण, केंद्रीय टीमों के दौरे, समीक्षा बैठकें किए सीधे सूखा घोषित करने का एलान करके ही सरकार को किसानों को दिलासा देने के लिए मेड़ पर जाना चाहिए था, लेकिन सरकार लौटती बारिश का इंतजार करते हुए मंत्रालय में बैठी रही। लौटती बारिश से भी जली हुई फसलें नहीं बचेंगी, यह साफ दिखते हुए और जिलों से वैसी रिपोर्ट आते हुए भी सरकार ने सूखे की घोषणा को पंचांग और मुहूर्त में अटकाकर रखा। एक तरफ फसल-पानी और मवेशियों के चारे व पानी की
स्थिति ऐसी विकट
हो गई है, तो दूसरी तरफ मंडी समितियां और व्यापारी भी किसानों की जान के दुश्मन बनते दिख रहे हैं। परभणी जिले की सेलू तालुका के एक किसान ने नकदी फसल के तौर पर मिर्च की खेती की थी। सूखे में भी जैसे-तैसे उसने मिर्च बचाई। दिन-रात मेहनत करके जीवन कवडे नाम के इस किसान ने चार क्विंटल मिर्च का उत्पादन किया। लेकिन व्यापारी ने उसके हाथ पर ४०० किलो मिर्च के पैसे दिए महज १ हजार १७ रुपये। चार क्विंटल मिर्च तुड़ाई का मजदूरी खर्च ही हुआ दो हजार रुपए। इसके अलावा बुआई से लेकर बीज, खाद का और बाजार में मिर्च ले जाने का परिवहन खर्च अलग। मुनाफा तो छोड़िए, इस किसान का मिर्च तुड़ाई का खर्च भी नहीं निकला। केवल जीवन कवडे इस किसान की ही नहीं, बल्कि राज्य के सभी मिर्च उत्पादक किसानों की ऐसी लूट जारी है। इसलिए मुख्यमंत्री और मंत्रियों का केवल मेड़ पर जाकर काम नहीं चलेगा, बल्कि किसानों को लूटने वाले बिचौलियों को सीधे रास्ते पर लाने के लिए वे मंडी समितियों का भी दौरा करें और किसानों के इस क्रूर मजाक को अपनी आंखों से देखें। आज तक कभी न देखा और न झेला हो, ऐसा सूखे का भीषण संकट महाराष्ट्र पर आया है। मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र, विदर्भ के अनेक जिलों में ऐन बारिश में ही सूखे ने किसानों की धज्जियां उड़ा दी हैं। देर से ही सही, मेड़ पर पहुंचे मुख्यमंत्री और सरकार ने सूखे की भीषणता और किसानों का चीत्कार अपनी खुली आंखों से देखा है। यह किसानों के जीवन-मरण का ही सवाल है। सारे नियम, कानून-कायदे, मानदंड वगैरह दरकिनार करके सरकार किसानों के लिए तिजोरी पूरी तरह खोल दे, ऐसा यह अभूतपूर्व संकट है। किसानों को बचाने के लिए यह करना ही होगा। मेड़ पर का चीत्कार मुख्यमंत्री ने खुद सुना। क्या अब तो यह सरकार पिघलेगी?
