-हार की ईवीएम खराब, जीत की बिल्कुल चकाचक?
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने रविवार को विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस और उसके साथी चुनाव हारते हैं तभी चुनाव आयोग और ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं; जीत जाएं तो कोई शिकायत नहीं करते। उन्होंने तेलंगाना, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल का उदाहरण भी दिया।
राजनीति का यह पुराना खेल बड़ा सुविधाजनक है। जीत गए तो मशीन लोकतंत्र की देवी। हार गए तो मशीन पर शक। मगर अब सवाल थोड़ा उलटा भी है, अगर हर शिकायत सिर्फ हार का बहाना है, तो चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों ने दस महीनों में कम से कम १४ बार प्रक्रियागत आपत्तियां क्यों दर्ज कीं? और आयोग ने शनिवार को ईसीआईनेट की समीक्षा, बैठकों के एजेंडा-मिनट्स और फील्ड प्रक्रिया समेत नौ पैâसले क्यों किए? इंडियन एक्सप्रेस की ताजा पड़ताल कहती है कि इनमें कई बदलाव उन्हीं मुद्दों को छूते हैं, जिन पर अंदर से आपत्तियां उठी थीं।
अब इसे भी क्या चुनावी हार माना जाए?
शिंदे ने एक और बात कही-ईवीएम की शुरुआत कांग्रेस के शासनकाल में हुई थी। बात ऐतिहासिक रूप से सही दिशा में है, लेकिन इससे आज की मतदाता सूची, एसआईआर, फॉर्म-६ या ईसीआईनेट से जुड़े हर सवाल का जवाब अपने-आप नहीं मिल जाता।
यानी तर्क कुछ ऐसा हुआ, ‘प्रिâज आपने खरीदा था, इसलिए अब उसमें खराबी की शिकायत करने का अधिकार भी आपका नहीं!’ विपक्ष के आरोपों की जांच होनी चाहिए, यह ठीक। लेकिन संस्था पर उठा हर सवाल ‘हार की खीझ’ बताकर टाल देना भी जवाब नहीं। लोकतंत्र में मशीन से ज्यादा जरूरी है भरोसा और भरोसा भाषण से नहीं, रिकॉर्ड और जवाब से बनता है। सठिया गइल का… कि चुनाव जीतते ही सारे सवाल भी विजयी जुलूस में गायब हो जाते हैं?
