अरुण कुमार गुप्ता
दिल्ली की मतदाता सूची में एक बूथ के ७२९ में से ७२८ नाम गायब होने का मामला अब और गंभीर हो गया है। इनमें से करीब ४७५ लोगों ने नाम दोबारा शामिल कराने के लिए आवेदन किया है। यानी जिन नामों को ड्राफ्ट सूची में जगह नहीं मिली, वे अब अपने वोटिंग अधिकार के लिए चुनावी सिस्टम के सामने दावा पेश कर रहे हैं। चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र के बेला एस्टेट के बूथ नंबर ३८ पर एसआईआर से पहले ७२९ मतदाता दर्ज थे। अब ड्राफ्ट सूची में केवल एक नाम बचा है। अधिकारियों ने इलाके में पुराने मकानों के टूटने और वहां की आवासीय स्थिति बदलने को भी इसका एक कारण बताया है। लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। इलाके की आवासीय स्थिति बदली तो क्या मतदाता भी अपने आप ‘गायब’ हो गए? अब प्रशासन को प्रत्येक दावे की जांच कर यह स्पष्ट करना होगा कि किसका नाम क्यों हटाया गया और किस आधार पर वापस जोड़ा जा रहा है। इस मामले को लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। लेकिन लोकतंत्र में सवाल छोटा नहीं है। अगर ७२९ में से ७२८ नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हो सकते हैं और फिर सैकड़ों लोग उन्हें वापस जोड़ने के लिए आवेदन कर सकते हैं, तो मतदाता सूची की शुरुआती जांच में इतनी बड़ी खामी कैसे पैदा हुई?
वोटर लिस्ट का ‘डिजिटल खेल’!
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। सबसे बड़ा सवाल अब ईसीनेट को लेकर है। आयोग ने खुद इस डिजिटल व्यवस्था की विशेषज्ञों से समीक्षा कराने का पैâसला किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त थी तो उसकी स्वतंत्र समीक्षा की जरूरत क्यों पड़ी? चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले १० महीनों में कम से कम १४ बार आयोग के भीतर मतदाता जोड़ने, नाम हटाने और चुनावी आंकड़ों के केंद्रीकरण से जुड़े पैâसलों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मतदाता आंकड़ों पर बढ़ते केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठाए गए। यहां चुनाव आयोग से सवाल पूछा जा सकता है। जब उसके अपने दो आयुक्त प्रक्रिया और डिजिटल व्यवस्था को लेकर आपत्ति जता रहे थे, तो इन आपत्तियों का पूरा जवाब सार्वजनिक रूप से पहले क्यों नहीं दिया गया? गोवा में ९७ मतदाताओं को स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद पात्र माना, लेकिन उन्हें दोबारा सूची में शामिल करने के लिए सॉफ्टवेयर में जरूरी विकल्प उपलब्ध नहीं था। तो सवाल सीधा है कि अगर कानून के तहत पैâसला लेने वाला अधिकारी किसी मतदाता को पात्र मानता है और सॉफ्टवेयर उस फैसले को लागू ही नहीं कर पाता, तो अंतिम ताकत अधिकारी के पास है या डिजिटल व्यवस्था के पास? चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर से जुड़े पैâसले आयोग की सामूहिक मंजूरी से लिए गए हैं और ईसीनेट की समीक्षा तथा व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया शुरू की गई है। लेकिन सवाल फिर वही है कि मतदाता का नाम किसी तकनीकी सीमा का मोहताज क्यों हो? अगर डिजिटल व्यवस्था में खामी मिली तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? और जिन मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए, उन्हें जवाब कौन देगा? इसलिए ईसीनेट की जांच के साथ चुनाव आयोग को प्रक्रिया, जिम्मेदारी और सुधार तीनों पर साफ जवाब देना होगा।
