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संपादकीय : शिवाजी पार्क का ‘बूंदी लड्डू’

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने २ अक्टूबर से चुनाव आयोग में भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की घोषणा की। यह आंदोलन लोकतंत्र बचाने के लिए है। आंदोलन की शुरुआत मुंबई से करने का उनका इरादा था। एक तो उस दिन महात्मा गांधी की जयंती है और गांधी जी ने मुंबई से ही अंग्रेजों को ‘भारत छोड़ो’ की चेतावनी देकर आंदोलन की चिंगारी सुलगाई थी। इसलिए कॉकरोच पार्टी के नेताओं का रुख बिल्कुल सही था। लेकिन सबसे पहले मुंबई पुलिस ने दीपके के आंदोलन की इजाजत देने से इनकार कर दिया। जब दीपके ने शिवाजी पार्क की सड़क पर संविधान प्रेमी जनता को जुटने का आह्वान करने के लिए शिवतीर्थ पर पत्रकारों को बुलाया, तब शिवाजी पार्क इलाके के कुछ लोग नीचे उतर आए और उन्होंने दीपके व उनके ‘लोकतंत्र बचाओ’ आंदोलन का विरोध किया। इन लोगों का कहना है कि ऐसे आंदोलन से उन्हें परेशानी होती है। शिवाजी पार्क कोई राजनीतिक नाट्यगृह या राजनीतिक अखाड़ा नहीं है। ऐसा विरोध मोदी-शाह की तानाशाही का खुला समर्थन है। ब्रिटिश काल में आजादी के लिए लड़ने वाले वीरों के खिलाफ कुछ भारतीय अंग्रेज-प्रेमी खुलकर रुख अपनाते थे। स्वतंत्रता सेनानियों की चुगली अंग्रेज अधिकारियों से करके इनाम और सरकारी नौकरियां हासिल करते थे, और उन्हीं के वंशज आज दिल्ली और महाराष्ट्र में सत्ता का सुख भोग रहे हैं। शिवाजी पार्क की इमारतों से नीचे उतरे यह मुट्ठी भर लोग उसी वंशावली के होने चाहिए। या तो यह कट्टर अंधभक्त हैं या फिर फिलहाल देश में जिस
तानाशाही का अतिरेक
चल रहा है, उसके समर्थक हैं। इन संघी सोच वाले लोगों की वजह से ही राष्ट्र के नामर्द बनने का खतरा पैदा हो गया है। एक युवा लड़का अमेरिका से अच्छे मौके छोड़कर भारत आता है। शिक्षा में भ्रष्टाचार, पेपर लीक और उसके भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंकता है। उसका साथ देना चाहिए या उसका विरोध करना चाहिए? दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन्हीं दीपके ने शिक्षा क्षेत्र के भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकार भरी थी। उनके इस आंदोलन ने मोदी सरकार को भूकंप के जोरदार झटके दिए थे। लाखों लोग दिल्ली की सड़कों पर उतरकर संसद के दरवाजे तक पहुंच गए थे। तब मोदी-शाह का नशा उतरा और उन्हें उस समय के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा। इन कॉकरोचों को कम आंकने वालों का पूरी तरह पोपट हो गया। देश के लिए जेल जाना, लाठियां खाना, छाती पर गोलियां झेलना, इसके लिए देश की ‘जेन-जी’ पीढ़ी तैयार है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता बीजेपी की खूंटी पर टांग रखी है। मतदाता सूची से १३ करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खुलासा होने पर देश सहम गया है। इस डकैती के खिलाफ लोग आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन शिवाजी पार्क द्वीप के कुछ रहिवासियों को राष्ट्रीय आंदोलन से तकलीफ हो रही है। शिवाजी पार्क राजनीतिक अखाड़ा या राजनीतिक सर्कस की जगह न होने के ‘बूंदी लड्डू’ होने का शिगूफा उन्होंने छोड़ा है। इन सबको शिवाजी पार्क और इसके आसपास का ज्वलंत इतिहास मालूम नहीं है। भारतीय स्वतंत्रता, संयुक्त महाराष्ट्र, शिवसेना की स्थापना और जनता पार्टी के आपातकाल-विरोधी संघर्ष का राजनीतिक अखाड़ा यही शिवाजी पार्क था। इसी मैदान से
राष्ट्रीय और महाराष्ट्रीय
नेताओं ने ताल ठोकी है। शिवाजी पार्क पर राजनीतिक अखाड़े और सर्कस न सजे होते, तो आज शिवाजी पार्क का मराठीपन कायम न रहता और शिवाजी पार्क ‘अडानी-लोढा’ पार्क बन चुका होता। शिवाजी पार्क यानी मुंबई की आत्मा है। यहीं शिवसेना की स्थापना हुई। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने यहीं से सुस्त पड़े मराठी मन को आवाज दी और जगाया। आंदोलन से लोकतंत्र जिंदा रहता है, लेकिन पिछले दस सालों में मोदी-शाह ने हर तरह के आंदोलन पर रोक लगा दी है। लोकतंत्र जनता द्वारा जनता के लिए बनाई गई व्यवस्था है। मतदान का अधिकार जब भ्रष्ट तरीके से छीना जाता है, तब सड़कों पर उतरना कोई अपराध नहीं होता। महात्मा गांधी जी ने सत्याग्रह किया। बालासाहेब ठाकरे मराठी जनों के लिए लड़ते रहे। उसका गवाह यह शिवाजी पार्क इलाका है। वीर सावरकर, प्रबोधनकार ठाकरे, आचार्य अत्रे जैसे जुझारू लोग शिवाजी पार्क के ही थे। उन्होंने लाखों की सभाएं लीं। पूरा शिवाजी पार्क तब खचाखच भरा रहता था। यह इतिहास मौजूदा ‘संघी सोच वाले’ रहवासी मिटा नहीं पाएंगे। शिवाजी पार्क में ‘नीट’ पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन सफल रहा। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उठी जीत की लहर का नजारा शिवाजी पार्क ने देखा है। शिवाजी पार्क ने महाराष्ट्र और देश को दिशा दी। अभिजीत दीपके का विरोध देश की आजादी, लोकतंत्र और संविधान का विरोध है। यह विरोध करने वाले ही असली ‘दिमागी नक्सल’ हैं। शिवाजी पार्क में अगर नामर्दी की घास उग रही हो, तो उसे उखाड़ फेंकना ही होगा!

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