-पितृपक्ष में उगते सूर्य को जल अर्पित कर पूर्वजों का स्मरण करें; सूर्य और पितृ मंत्र का 21 बार जाप
शीतल अवस्थी
सनातन परंपरा में सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता, जीवनदाता और समस्त प्राणियों की ऊर्जा का स्रोत माना गया है। पितृपक्ष में सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूर्वजों का स्मरण करना पितृदोष शांति का सरल उपाय बताया गया है, जो लोग विस्तृत श्राद्ध या तर्पण नहीं कर पाते, वे भी यह छोटी पूजा कर सकते हैं।
आवश्यक सामग्री
* तांबे का लोटा
* स्वच्छ जल
* सफेद आक का पुष्प, उपलब्ध होने पर
* काले तिल
* घी अथवा तेल का दीपक
* धूप या अगरबत्ती
* चंदन या रुद्राक्ष की माला
अर्घ्य देने की विधि
सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें सफेद आक का फूल डालें। फूल उपलब्ध न हो तो केवल स्वच्छ जल से भी अर्घ्य दिया जा सकता है।
पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्यदेव को धीरे-धीरे जल अर्पित करें। अर्घ्य देते समय 21 बार यह मंत्र बोलें—
ॐ सूर्याय नमः॥
सीधे सूर्य को देर तक न देखें। जल ऐसे स्थान पर छोड़ें जहां फिसलन या गंदगी न फैले।
इसके बाद करें पितृ पूजा
सूर्य को अर्घ्य देने के बाद घर के पूजा-स्थान में दीपक और धूप जलाएं। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए अपने पूर्वजों का नाम एवं गोत्र स्मरण करें। यदि जानकारी न हो तो कुल के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को प्रणाम करें।
इसके बाद 21 बार जाप करें—
ॐ पितराय नमः॥
जाप पूरा होने पर प्रार्थना करें
“हे पितृदेव! हमारे परिवार से जाने-अनजाने हुई भूलों को क्षमा करें। हमें सद्बुद्धि, स्वास्थ्य, एकता और धर्म के मार्ग पर चलने का आशीर्वाद दें।”
पूजा के बाद करें सेवा
* गाय को रोटी या हरा चारा दें।
* कौए और पक्षियों के लिए अन्न-जल रखें।
* किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं।
* माता-पिता और बुजुर्गों का आशीर्वाद लें।
* पूर्वजों के नाम पर वृक्ष लगाएं अथवा सेवा कार्य करें।
धार्मिक मान्यता में सूर्य अर्घ्य आत्मबल, अनुशासन और सकारात्मकता का प्रतीक है। पितृ स्मरण व्यक्ति को अपनी जड़ों और पारिवारिक दायित्वों से जोड़ता है। इसलिए पूजा के साथ परिवार में प्रेम, बुजुर्गों की सेवा और सदाचरण बनाए रखना भी जरूरी है।
