सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन की हालिया कार्रवाई ने साबित किया है कि महंगा अथवा प्रतिष्ठित रेस्तरां होना सुरक्षित भोजन की गारंटी नहीं है। मुंबई में कयानी एंड कंपनी, कोलाबा स्वीट मार्ट, सबवे, रॉयल चाइना और अन्य प्रतिष्ठानों सहित १३ खाद्य कारोबारियों के लाइसेंस निलंबित किए गए अथवा कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। कयानी के निरीक्षण में चूहे की बीट, मक्खियां, मरे कॉकरोच, खुले सीवर मैनहोल और रेप्रिâजरेटर में जमा खून मिलने का दावा किया गया। लोअर परेल के सबवे आउटलेट में खराब रेप्रिâजरेटर, दुर्गंध, फफूंद जैसी परत और जीवित कॉकरोच पाए जाने की बात सामने आई।
यह कार्रवाई केवल जुर्माने अथवा लाइसेंस की नहीं, ग्राहक के स्वास्थ्य और जान के अधिकार की लड़ाई है। उपभोक्ता गंदगी, कीड़े, बदबू, खराब भंडारण अथवा एक्सपायरी सामान दिखने पर बिल और तस्वीर सुरक्षित रखकर महाराष्ट्र एफडीए तथा एफएसएसएआई के ‘फूड सेफ्टी कनेक्ट’ माध्यम से शिकायत कर सकते हैं। अब असली कसौटी यह होगी कि बंद प्रतिष्ठान सुधार के प्रमाण के बिना दोबारा न खुलें और निरीक्षण त्योहार खत्म होते ही ठंडे न पड़ जाएं। एक छापे से नहीं, नियमित निगरानी से ग्राहक का हक सुरक्षित होगा।
७६ वर्षीय महिला का बीमा ‘क्लेरिकल गलती’ पर रोका…अब ₹४.५ लाख देने का आदेश
नई दिल्ली। स्वास्थ्य बीमा के नाम पर वरिष्ठ नागरिकों को कागजी त्रुटियों में उलझाने वाली कंपनियों को दिल्ली जिला उपभोक्ता आयोग ने कड़ा संदेश दिया है। आयोग ने ७६ वर्षीय महिला का चिकित्सा दावा अस्वीकार करने वाली निजी बीमा कंपनी को करीब ₹४.५ लाख चुकाने का आदेश दिया है। बीमा कंपनी ने दावा किया था कि महिला ने जरूरी दस्तावेज नहीं दिए और पॉलिसी में दर्ज गुर्दे की बीमारी संबंधी जानकारी के कारण दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। महिला ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उसने पॉलिसी लेते समय अपनी पूर्व बीमारियों की जानकारी दी थी। कंपनी ने पॉलिसी जारी करने से पहले उसकी चिकित्सा जांच भी कराई थी। रिकॉर्ड देखने के बाद आयोग ने माना कि गुर्दे की बीमारी का उल्लेख लिपिकीय त्रुटि था। जब बीमाकर्ता ने ग्राहक की स्वास्थ्य जांच करने और उपलब्ध विवरण देखने के बाद पॉलिसी जारी की, तब वह बाद में उसी रिकॉर्ड की गलती का लाभ उठाकर वैध दावा नहीं रोक सकता।
आयोग ने कंपनी का दावा अस्वीकार करना अनुचित मानते हुए भुगतान का आदेश दिया। यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों और स्वास्थ्य बीमा धारकों के लिए महत्वपूर्ण है। पॉलिसी लेते समय प्रस्ताव-पत्र की प्रति, चिकित्सा जांच रिपोर्ट, भुगतान रसीद और बीमा पत्र सुरक्षित रखना जरूरी है। पॉलिसी मिलने के बाद नाम, उम्र और दर्ज बीमारियों की जांच तुरंत कर लेनी चाहिए।
-₹१० ज्यादा पार्किंग शुल्क पड़ा ₹२२ लाख का
-उपभोक्ता आयोग का बड़ा संदेश
-अस्पताल प्रशासन को गरीब मरीजों के लिए ₹२० लाख और ठेकेदार को सड़क सुरक्षा पर ₹२ लाख जमा करने का आदेश; शिकायतकर्ता को अलग से ₹१५ हजार मिलेंगे।
नई दिल्ली। हिमाचल प्रदेश के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में महज ₹१० अधिक पार्किंग शुल्क वसूलना अस्पताल प्रशासन और पार्किंग ठेकेदार को भारी पड़ गया। कांगड़ा जिला उपभोक्ता आयोग ने मामले में करीब ₹२२ लाख जमा कराने के साथ पार्किंग व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए हैं। शिकायतकर्ता १० जून को अपने रिश्तेदार को आपातकालीन विभाग में लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कॉलेज, टांडा पहुंचे थे। निर्धारित दर चारपहिया वाहन के लिए ₹२० प्रति घंटा थी। वाहन दो घंटे से कम समय खड़ा रहने के कारण शुल्क ₹४० बनता था, लेकिन कर्मचारियों ने कथित रूप से ₹५० वसूले। विरोध करने पर दुर्व्यवहार और वाहन रोकने का आरोप भी लगाया गया। आयोग ने मेडिकल अधीक्षक, प्राचार्य और स्वास्थ्य सचिव को ६० दिनों के भीतर ₹२० लाख जिला रेडक्रॉस सोसायटी, कांगड़ा में जमा कराने का निर्देश दिया। यह रकम केवल गरीब मरीजों की सहायता में इस्तेमाल होगी। पार्किंग ठेकेदार को ₹२ लाख सड़क सुरक्षा जागरूकता और हेलमेट वितरण के लिए जमा करने होंगे। शिकायतकर्ता को ₹१५ हजार देने का भी आदेश हुआ। आयोग ने कहा कि पार्किंग शुल्क कानूनी और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना नहीं लगाया जा सकता। अस्पताल को दो महीने में पार्किंग पक्की करने, लाइनें खींचने, जनसुविधाएं उपलब्ध कराने और अनुमोदित दरें स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने के निर्देश भी दिए गए।
