सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की महायुति सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन कई जिलों में सरकारी व्यवस्था की तस्वीर कुछ और ही कहानी बता रही है। पालकमंत्री का पद महीनों तक सत्ता संघर्ष में उलझा रहा और अब पद मिलने के बाद भी विकास को गति नहीं मिल पा रही है। ऐसा आरोप राज्य के मंत्री ही अपनी सरकार पर लगा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर शिंदे गुट के मंत्री भरत गोगावले ने रायगड जिले में विकास को लेकर निधि नहीं मिलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पालकमंत्री की नियुक्ति होने के बावजूद जिला नियोजन समिति की बैठक का मुहूर्त अब तक नहीं निकल पाया है। नतीजा यह कि करोड़ों रुपए की निधि उपलब्ध होने के बावजूद विकास कार्यों को मंजूरी नहीं मिल पा रही है। करीब पौने दो वर्ष तक महायुति के भीतर रायगड के पालकमंत्री पद को लेकर खींचतान चलती रही। आखिरकार अगस्त में भरत गोगावले को पालकमंत्री बनाया गया, लेकिन पद मिलने के बाद भी जिले की विकास व्यवस्था पटरी पर नहीं लौट सकी। सबसे गंभीर बात यह है कि रायगड के लिए ५१७ करोड़ रुपये के विकास आराखड़े में से ३१७ करोड़ रुपए का निधि उपलब्ध कराया जा चुका है, लेकिन जिला नियोजन समिति की बैठक और उसके गठन की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण इस राशि से विकास कार्यों को मंजूरी नहीं मिल पा रही है।
