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संपादकीय : ऐसा ‘नटसम्राट’ फिर कभी नहीं होगा!

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर यूं अचानक दुनिया को अलविदा कह देंगे, यह बात दिल को आसानी से मंजूर नहीं होती। गुरुवार की सुबह नाना पाटेकर के निधन की खौफनाक खबर लेकर आई। नाना का यूं अचानक चले जाना कोई मामूली धक्का नहीं है; पूरे कला जगत को झकझोर कर रख देनेवाला यह एक जबरदस्त जलजला है। नाना पाटेकर सिर्फ एक अदाकार या अभिनेता के तौर पर ही महान नहीं थे, बल्कि उससे भी बढ़कर एक विशाल दिल वाले इंसान थे। क्रूर काल ने उनके इसी विशाल दिल को दिल के दौरे के लिए चुना। जिस इंसान की धड़कनें हमेशा समाज के लिए धड़कती थीं, उस दिल की धड़कन हमेशा के लिए बंद करके ईश्वर को क्या हासिल हुआ? उम्र के पचहत्तर साल बेशक पूरे हो चुके थे, लेकिन शारीरिक रूप से मजबूत और तगड़े नाना के आसपास बुढ़ापे के निशान कभी भटकते तक नहीं थे। इसके अलावा रोजाना कसरत और शारीरिक मेहनत तो थी ही। नाना पाटेकर को उनके चाहने वालों ने हमेशा उसी पुरजोश अंदाज में देखा था; यही वजह है कि नाना का यूं अचानक चले जाना किसी के गले नहीं उतरता। गोवा स्थित घर में आधी रात को जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा, तब बदकिस्मती से उनके पास कोई मौजूद नहीं था; वरना वक्त पर इलाज मिल जाता तो यह जुझारू नाना मौत के इस हमले को भी यकीनन नाकाम कर देता। नाना का शुरुआती जीवन बेहद तंगहाली में बीता, लेकिन हालात का रोना रोते रहने के बजाय १३ साल की उम्र से ही उन्होंने अदाकारी के साथ-साथ जिंदगी जीने की जद्दोजहद शुरू कर दी। बचपन में ही रंगमंच पर कदम रखने के बाद मशहूर निर्देशिका विजया मेहता और सुलभा देशपांडे ने नाना के अंदर के अभिनय कौशल को पहचाना और एकांकी से शुरू हुआ उनका सफर प्रायोगिक और व्यावसायिक नाटकों तक जा पहुंचा। जयवंत दलवी के नाटक ‘पुरुष’ में नाना पाटेकर ने गुलाबराव नाम के एक बेरहम और शोषक नेता का किरदार निभाया था। विलेन का यह किरदार नाना इतनी शिद्दत और जीवंतता से निभाते थे कि यह जानते हुए भी कि यह महज एक नाटक है, दर्शकों के तलवों की आग दिमाग तक पहुंच जाती थी। इसी नाटक के एक शो के दौरान एक दर्शक ने उन पर चप्पल फेंक कर मारी थी; नाना पाटेकर के निभाए खलनायक को मिली यह
‘सर्वोच्च दाद’
थी। करीब १६ सालों तक नाना पाटेकर ने ‘पुरुष’ नाटक में काम किया और देश-विदेश में इसके १,८०० से भी ज्यादा शो हुए। ‘हमीदाबाई ची कोठी’ नाटक में नाना द्वारा निभाया गया ‘सत्तार’ नाम के दलाल का किरदार भी बेहद मशहूर हुआ। ‘गुलाबराव’ और ‘सत्तार’ दोनों ही किरदार नाना पाटेकर के थिएटर करियर की सबसे ताकतवर और अमर भूमिकाएं मानी जाती हैं। १९७८ में ‘गमन’ फिल्म के जरिए हिंदी सिनेमा में कदम रखने के बाद से लगभग पांच दशकों तक नाना पाटेकर ने एक दमदार और सामर्थ्यवान अभिनेता के रूप में फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया। नाना पाटेकर को असली पहचान दी एन. चंद्रा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अंकुश’ ने। रविकांत देशमुख नाम के बेरोजगार नौजवान का किरदार निभाते हुए बेरोजगारी, मायूसी और अन्याय के खिलाफ भड़कने वाले युवा के गुस्से को नाना पाटेकर ने इस भूमिका के जरिए उभारा। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई; यह किरदार जबरदस्त हिट रहा और वहीं से नाना ने हिंदी सिनेमा में अपनी उड़ान भरी। अभिनय में स्वाभाविकता और संवाद अदायगी की अद्भुत कला नाना पाटेकर की सबसे बड़ी ताकत थी। ‘परिंदा’ जैसी सुपरहिट फिल्म में उन्होंने ‘अन्ना’ नाम के बेहद हिंसक, बेरहमी और क्रूर गैंगस्टर का किरदार निभाया था; इस फिल्म में अपने अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। नाना के तरकश का सबसे असरदार हथियार था उनकी तेज तर्रार संवाद अदायगी, जिसकी वजह से उनके संवादों का एक अलग ही क्रेज बन गया। ‘क्रांतिवीर’ के ‘ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून…’ और ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…’ जैसे संवादों ने दर्शकों के दिलों को छू लिया। ‘खामोशी’ फिल्म में न सुन सकने और न बोल सकने वाले मूक-बधिर पिता का किरदार निभाते हुए नाना पाटेकर ने इस भूमिका में जो जान फूंकी, वह हैरान कर देने वाली है। अपने अंदर के अभिनय कौशल को उन्होंने कभी किसी खास दायरे में वैâद करके नहीं रखा। गंभीर,
आक्रामक और संवेदनशील
किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर ने ‘वेलकम’ जैसी फिल्म से उदय शेट्टी नाम के अंडरवर्ल्ड डॉन का हास्य किरदार निभाकर दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया। नाना की फिल्में और उनका अभिनय सिर्फ देशभक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि कारगिल युद्ध के दौरान वे खुद जवानों के साथ जंग के मैदान में उतरे थे। उससे पहले नाना द्वारा ली गई सैन्य ट्रेनिंग और निशानेबाजी में उनकी महारत को देखकर तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने उन्हें जंग में उतरने की इजाजत दी थी। सीमा पर लड़नेवाले ‘जवान’ और खेत में पसीना बहानेवाले ‘किसान’, इन दोनों के प्रति उनके दिल में बेहद लगाव था। २०१५ के भीषण सूखे को देखकर नाना पाटेकर का कलेजा छलनी हो गया। डेढ़ करोड़ रुपए की लग्जरी गाड़ी खरीदने का पैâसला रद्द करके नाना पाटेकर ने यह रकम अनगिनत किसान परिवारों में बांट दी। ‘नाम फाउंडेशन’ के जरिए सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में बड़ा काम किया। खुदकुशी करनेवाले किसानों के परिवारों की नाना पाटेकर ने खुले हाथों से आर्थिक मदद की। बचपन में गरीबी से की गई जद्दोजहद की कसक नाना पाटेकर ने दिल में हमेशा संभाल कर रखी। गोवा में दिए अपने आखिरी भाषण में उन्होंने यही विचार रखा था, ‘मुझे नहीं पता कि मैं कल रहूंगा या नहीं, लेकिन उससे पहले यानी मौत से पहले मैं समाज के लिए क्या कर सकता हूं?’ नाना पाटेकर एक सशक्त, सामर्थ्यवान, दमदार और रौबीले अभिनेता थे। फिल्मी दुनिया में अपार कामयाबी हासिल करने के बाद भी उनके अंदर का सीधा-साधा इंसान उस पांच सितारा दुनिया में नहीं रम पाया। कोई दिखावा नहीं; ‘सादा जीवन, उच्च विचार और बेबाक जबान’ को उन्होंने हमेशा अपना उसूल बनाए रखा। अपनी भरी हुई अंजुलि किसानों के लिए खाली कर देनेवाले नाना पाटेकर सही मायनों में सुपरस्टार थे। काम खत्म होते ही उन्हें पुणे के पास डोणजे गांव में बने अपने खेत के घर में वक्त बिताना पसंद था; उसी पसंदीदा जगह पर उन्हें आखिरी विदाई दी जाएगी। नाना पाटेकर के अभिनय में रंग था, आग थी, रौब था और दबदबा था। किसी भी किरदार में जान पंâूकनेवाले नाना पाटेकर का जिस्म आज बेजान हो चुका है, इस बात पर यकीन नहीं होता। दिल को छू लेने वाला ऐसा ‘नटसम्राट’ फिर कभी नहीं होगा!

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