सामना संवाददाता / नई दिल्ली
शेयर बाजार ने गुरुवार को ऐसा झटका दिया कि सरकार के आर्थिक दावों की चमक फीकी पड़ गई। सेंसेक्स १,०४५.४६ अंक टूटकर ७१,५९३.२४ पर बंद हुआ ३२ महीने का निचला स्तर। निफ्टी भी ३७१.२५ अंक गिरकर २२,२३१.८० पर पहुंच गया। बाजार से निकला संदेश साफ है: निवेशकों का भरोसा डगमगाया है।
सियासत में भी भाजपा को झटके लगे हैं। उत्तर प्रदेश में संजयन त्रिपाठी ने पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा; इससे पहले पूर्व मंत्री राम आसरे कुशवाहा भी भाजपा छोड़कर सपा में गए थे। ये घटनाएं अपने-आप में किसी व्यापक भगदड़ का प्रमाण नहीं, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी और नेतृत्व के पैâसलों पर सवाल जरूर उठाती हैं।
सरकार के आर्थिक दावे पर उठे सवाल
यह राजनीतिक कटाक्ष है, बाजार का आधिकारिक निष्कर्ष नहीं। शेयर बाजार किसी प्रधानमंत्री की विदाई की भविष्यवाणी नहीं करता। लेकिन जब विदेशी पूंजी लगातार बाहर जाए, तेल महंगा हो और सूचकांक महीनों के निचले स्तर पर फिसले, तो सरकार के लिए इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं। हर गिरावट के पीछे वैश्विक कारण गिनाने से जवाबदेही खत्म नहीं होती। निवेशकों को भरोसा, कारोबार को स्थिरता और जनता को महंगाई से राहत देना सरकार की परीक्षा है। विदाई का पैâसला जनता करेगी; बाजार ने फिलहाल सरकार के आर्थिक दावों पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
