-पहले गिरफ्तारी का डर, अब सुधार का एलान, पुराने पीड़ितों को न्याय कौन देगा?
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
जीएसटी परिषद का पैâसला राहत की दिशा में कदम है, लेकिन इससे बीते वर्षों का नुकसान अपने-आप मिट नहीं जाएगा। कारोबारियों ने लंबे समय से शिकायत की कि गिरफ्तारी की आशंका का इस्तेमाल कर उनसे भुगतान कराया गया। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, २०२१-२२ से २०२४-२५ के बीच केंद्रीय जीएसटी इकाइयों ने ७२,३९३ मामलों में ८८७ गिरफ्तारियां कीं। हर गिरफ्तारी को गलत नहीं कहा जा सकता; मगर हर कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा तो होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी २०२५ में कहा था कि गिरफ्तारी की धमकी देकर कर वसूलना अस्वीकार्य है और कानून के शासन का उल्लंघन है। दबाव या जबरदस्ती में कर जमा कराने वाले अदालत से रकम वापसी मांग सकते हैं; संबंधित अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी होनी चाहिए। यानी पीड़ितों के लिए न्याय का रास्ता पहले से मौजूद है, पर यह हर मामले में अपने-आप लागू नहीं होता; प्रभावित व्यक्ति को अपने दस्तावेजों और परिस्थितियों के आधार पर अदालत जाना पड़ सकता है। परिषद की सिफारिशें १ अप्रैल २०२७ से लागू होंगी। पुराने मामलों, लंबित अभियोजनों और पहले जारी नोटिसों का क्या होगा, यह संशोधित कानून और उसके संक्रमणकालीन प्रावधानों से तय होगा। १० हजार रुपए तक के लंबित नोटिस वापस लेने की घोषणा है, लेकिन उससे ऊपर के मामलों पर स्पष्टता जरूरी है। सरकार को पुराने मामलों की समयबद्ध समीक्षा, दबाव में वसूली गई रकम की वापसी, गलत गिरफ्तारी पर जवाबदेही और साबित नुकसान के लिए मुआवजे की व्यवस्था बतानी चाहिए।
यानी पीड़ितों के लिए न्याय का रास्ता पहले से मौजूद है, पर यह हर मामले में अपने-आप लागू नहीं होता।
