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पटना की पॉलिटिक्स : जवाबदेही से कब तक भागेगा चुनाव आयोग?

-अरुण कुमार गुप्ता
बिहार की राजनीति में चुनावी जनादेश को लेकर आर-पार की लड़ाई छिड़ गई है! विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने २०२५ के बिहार विधानसभा चुनाव को रद्द कर दोबारा चुनाव कराने की मांग उठाई है। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए पूछा है कि इतने गंभीर आरोपों और विपक्ष की मांगों पर आयोग की ओर से स्पष्ट जवाब क्यों नहीं आ रहा? विपक्ष ने चुनाव को अमान्य घोषित करने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर रोक लगाने जैसी मांगें उठाई। इन मांगों को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन भी सौंपा गया। अब सवाल सिर्फ विपक्ष की मांग का नहीं, चुनाव आयोग की जवाबदेही का भी है। यदि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, तो आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतों की संख्या कितनी है, कितने मामलों का निपटारा हुआ और पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए गए।
कुशवाहा के विधायकों ने बिगाड़ा जेडीयू का खेल!
बिहार में विधान परिषद चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर उम्मीदवारों को लेकर खींचतान तेज हो गई है। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के आधिकारिक उम्मीदवार आनंद पुष्कर के सामने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रदेश महासचिव राम पुकार सिन्हा के उतरने से गठबंधन की चुनावी रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। मामला तब और दिलचस्प हो गया, जब आरएलएम के तीन विधायकों ने सिन्हा के समर्थन का एलान किया। आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आलोक कुमार सिंह और विधायक माधव आनंद तथा रमेश्वर महतो ने राम पुकार सिन्हा के पक्ष में अपनी स्थिति स्पष्ट की। उनका कहना है कि सिन्हा ने पार्टी के लिए लंबे समय तक काम किया है और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को महत्व मिलना चाहिए। दूसरी ओर, कुशवाहा ने एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवारों के समर्थन की बात कही है। सारण सीट पर जेडीयू के उम्मीदवार को सहयोगी दल के नेताओं से अपेक्षित समर्थन मिलेगा या नहीं, यह अब बड़ा सवाल है।
पंचायत चुनाव पर ब्रेक!
बिहार में पंचायत चुनाव की तैयारी पर ऐसा ब्रेक लगा है कि गांवों की सत्ता किसके हाथ में जाएगी, इस सवाल का जवाब फिलहाल अधर में है। एक तरफ पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने की घड़ी करीब आ रही है, दूसरी तरफ परिसीमन, आरक्षण निर्धारण और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए जरूरी ‘ट्रिपल टेस्ट’ की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है। नतीजा यह कि समय पर चुनाव कराने की उम्मीद कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कार्यकाल समाप्त होने की तारीख सामने है, तो सरकार और निर्वाचन आयोग ने तैयारी समय रहते पूरी क्यों नहीं की? ९ अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, पांच अक्टूबर को पटना हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सरकार ने समय पर पंचायत चुनाव करा पाने में कठिनाई जताई। मामले की अगली सुनवाई २६ नवंबर को निर्धारित है।

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