मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश: स्वाद ही उतर गया कचौड़ी-समोसे का!

तरकश: स्वाद ही उतर गया कचौड़ी-समोसे का!

-धनुर्धर

लीजिए, फिर लग गया कल्चरल शॉक! न-न, इस बार प्रधानमंत्री को नहीं लगा है। उन्हें तो जंतर-मंतर पर लड़कियों के श्रीमुख से अपने लिए निकलती गालियां सुनकर लगा था। असल में, गालियां तो गालियां होती हैं का तर्क काम नहीं करता। वे किस मुंह से निकल रही हैं, यह बड़ी बात होती है। वरना तो अपने छोकरे गालियों की ही जबान में बात करते हैं। एक वाक्य उनका पूरा नहीं होता दो-चार गालियों से सुशोभित हुए बगैर।
प्राउड फॉलोवर
क्या यह बात अपने मोदी जी नहीं जानते थे? बिल्कुल जानते थे साहब। उनकी ट्रोल आर्मी ऐसे ही छोकरों से भरी रही है। डंके की चोट पर इन सबको फॉलो करने का श्रेय भी मोदी जी को जाता है। वह इनके प्राउड फॉलोवर रहे हैं। मोदी जी जैसा फॉलोवर पाकर ये सब भी सोशल मीडिया पर गर्वोन्मत्त घूमते जिस-तिस को गालियों से नवाजते रहे हैं। यह बात बार-बार मोदीजी के संज्ञान में लाई जाती रही है, ताकि कल को वे यह न कहें कि भई हमें तो किसी ने बताया ही नहीं कि हम इन जैसों को फॉलो करते हैं।
मन से माफी
कभी माननीय मुलायम सिंह ने रेपिस्टों के प्रति लाड़ दिखाते हुए कहा था, ‘भई बच्चे हैं, बच्चों से गलती हो जाती है।’ मोदी जी इस मामले में मुलायम सिंह से ज्यादा सयाने हैं। वह अमूमन ऐसे तत्वों के पक्ष में बयान नहीं देते। जो कहना होता है खुद कह देते हैं विरोधियों को। कभी जर्सी गाय तो कभी ५० करोड़ की गर्लप्रâेंड बता देते हैं। लेकिन क्या मजाल कि कभी गालियां देने वालों या छेड़छाड़ करनेवालों के पक्ष में जुबान खोली हो। बहुत जरूरी हो जाए तब भी यही कहते हैं कि मैं फलां को कभी मन से माफ नहीं कर पाऊंगा।
टिकट की बात अलग
अब आप हिसाब लगाते रहिए उनके मन का। किसी को लोकसभा चुनाव में पार्टी का टिकट दे देना या गांधी हत्या को जायज ठहराने, गोडसे का गुणगान करने के बाद भी पार्टी से न निकालना इस बात का सबूत थोड़े ही है कि उसे मन से माफ कर दिया गया है। आदमी को बहुत कुछ मन मारकर भी करना पड़ता है राजनीति में। सो, मोदी जी ने वह सब कुछ मन मारकर ही किया होगा, ऐसा आसानी से माना जा सकता है।
लड़की कहां है
बहरहाल, मुद्दे की बात यह है कि मोदी जी ने कभी इन गालीबाजों के पक्ष में कोई बयान नहीं दिया। चुपचाप फॉलो करते रहे उन्हें। लेकिन आपको ध्यान देना चाहिए इस तथ्य की ओर कि इन गालीबाजों में कभी कोई लड़की शामिल नहीं की गई। इतनी लंबी-चौड़ी टीम रही उनकी ट्रोल आर्मी की, क्या उसमें लड़कियों को शामिल नहीं किया जा सकता था। बिल्कुल किया जा सकता था, लेकिन नहीं किया गया। आप कहेंगे बीजेपी समर्थक कई महिलाएं खुलकर सोशल मीडिया पर विरोधियों के साथ गाली-गलौज करती देखी गई हैं। हो सकता है, लेकिन क्या मोदी जी ने इनमें से किसी को फॉलो किया कभी? नहीं किया।
महिलाओं से उम्मीद
कैसे करते। उन्होंने तो महिलाओं से ही सारी उम्मीद लगा रखी थी। उन्हें मालूम था कि मर्दों का कोई भरोसा नहीं। वे तो सारे धतकरम करते ही हैं, अपनी बहन-बेटी-बीवी की इज्जत बचाते-बचाते उनका गला तक घोंट देते हैं। ये क्या कल्चर बचाएंगे। सो पूरी उम्मीद बेटियों से थी। वही बचाएंगी इस देश और समाज का संस्कार। और ऐसी बेटियों ने रणचंडी का रूप धरते हुए उन्हें ही गालियों से नवाजना शुरू किया। तो कल्चरल शॉक नहीं लगेगा भला।
कचौड़ी-समोसा
खैर वह पुरानी बात हो गई। उसके लिए आम माफी का एलान भी हो चुका है। असल झटका तो अब दिया है डीयू की लड़कियों ने। और मोदी जी को ही नहीं पूरी मर्द जाति को दिया है। दिल्ली की सड़कों पर रात के अंधेरे में निकल कर उन्होंने नारे लगाए- एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा। यानी कचौड़ी और समोसे का भरोसा हो सकता है, पर मर्दों का नहीं। मर्द तो कचौड़ी और समोसे से भी गये गुजरे हो गए।
हिम्मत नहीं हो रही
सदमे ने ऐसा असर दिखाया कि कि सारी अकड़ भूल गए। मासूमियत का अवतार बन पूछने लगे, भई क्या सारे मर्द एक जैसे होते हैं। लड़कियां भी हंसते हुए कह रही हैं, ‘नहीं बात तुम्हारी नहीं हो रही। तुम तो ऐसे नहीं लगते हो। तुम्हें हम आजमाएंगे, लेकिन जिन मर्दों ने अपनी जात दिखा दी है, जो रोज हमें बसों में, सड़कों पर, पार्कों में अपनी जात दिखाते हैं, उनकी लानत-मलामत कर लेने दो फिलहाल। तुम्हें तब देखेंगे जब तुम्हारी बारी आएगी।’ लड़कियां तो यह कहकर निकल गर्इं, मर्द बेचारा वहीं बैठा है नुक्कड़ वाली दुकान पर। कचौड़ी भी तली जा रही है, समोसा भी तैयार हो रहा है, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही इनकी तरफ देखने की।
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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