मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : तानाशाह डर गया... क्या `जंतर-मंतर' खामोश हो जाएगा?

संपादकीय : तानाशाह डर गया… क्या `जंतर-मंतर’ खामोश हो जाएगा?

मोदी-शाह और उनकी सरकार जनता के आंदोलनों से कितनी डरी हुई है, यह उनके नए रुख से साफ झलकता है। दिल्ली की पहचान सिर्फ सत्ता केंद्र, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय कार्यालयों, ऐतिहासिक इमारतों और राजनीतिक गतिविधियों तक ही सीमित नहीं है। दिल्ली की सड़कों ने ऐसे कई बुलंद नारों की आवाजें सुनी हैं। देशभर के पीड़ितों के आंदोलनों को आवाज दी है। कभी सीधे संसद के दरवाजों पर दस्तक, कभी बोट क्लब पर किसानों के आंदोलन का शक्ति प्रदर्शन, तो कभी `जंतर-मंतर’ पर दिन-रात, दिनों-दिन चलने वाले अनशन और धरने। सत्ताधारियों का विरोध करने की जगहें बदलती रहीं, लेकिन अपनी मांगों की आवाज सत्ताधारियों तक पहुंचाने की कोशिशें जारी रहीं। इस परंपरा पर सोमवार को `रुकावट’ आ गई। अमित शाह की दिल्ली पुलिस ने विरोध-प्रदर्शन की जगहों की सूची से `जंतर-मंतर’ को हटा दिया है। `जंतर-मंतर’ पिछले कुछ महीनों से मोदी-शाह के तानाशाही शासन को चुनौती देने का केंद्र बना हुआ था। भारतीय लोकतंत्र की आत्मा जैसे `जंतर-मंतर’ पर आजाद घूम रही थी। भाजपा समर्थित अन्ना हजारे का आंदोलन `जंतर-मंतर’ पर ही शुरू हुआ था। बीच में सोनम वांगचुक के नेतृत्व में परीक्षा में भ्रष्टाचार के खिलाफ शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए ३६ दिनों का आंदोलन `जंतर-मंतर’ पर ही हुआ था। वह इतना भड़क उठा कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मोदी को लेना पड़ा। कॉकरोच पार्टी के जन्मस्थान के रूप में `जंतर-मंतर’ का महत्व पिछले कुछ दिनों में रेखांकित हुआ है। अब `वोट चोरी’ के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के भ्रष्ट कामकाज के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन `जंतर-मंतर’ पहुंचने से पहले ही मोदी-शाह ने
`जंतर-मंतर’ पर लाखों सशस्त्र पुलिस
उतार दी और अब तो दिल्ली पुलिस ने `जंतर-मंतर’ पर विरोध-प्रदर्शन करने पर स्थायी रोक लगाकर मोदी सरकार की कायरता साबित कर दी है। रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड में आंदोलन करने के नए आदेश दिल्ली पुलिस ने जारी किए हैं। ये सभी जगहें मोदी-शाह के घर से, भाजपा कार्यालय से और संसद भवन से दूर हैं। यहां होने वाले आंदोलनों की गूंज न संसद में सुनाई देगी, न देश में। एक तरह से डरे हुए मोदी-शाह ने तानाशाही तरीके से दिल्ली के आंदोलनों को रोकने की कोशिश की है। `जंतर-मंतर’ पर लोकतंत्र का गला घोंटकर जनता की आवाज दबाने का यह तरीका निंदनीय है। लोकतंत्र में धरने, आंदोलनों और मोर्चों के लिए जगह है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में लोगों ने दिल्ली की कई सड़कों पर प्रदर्शन किए। चांदनी चौक, दरियागंज, टाउन हॉल, क्लॉक टॉवर, फिरोजशाह कोटला, कश्मीरी गेट, जामा मस्जिद के पास अंग्रेजों के शासन के खिलाफ प्रदर्शन होते रहे। आजादी के बाद सत्ताधारियों पर अंकुश रखने के लिए प्रदर्शनकारियों ने कई बार संसद के दरवाजे पर ही डेरा डाला और वही आंदोलन का स्थान बन गया। १९६६ तक संसद के दरवाजे पर ये आंदोलन जारी रहे। संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई जब दिल्ली पहुंची, तब शाहीर अन्नाभाऊ साठे `जाग मराठा… आम जमाना बदलेगा’ के सुर छेड़ते हुए ढपली पर थाप मारकर संसद भवन पहुंचे थे। इंडिया गेट और बोट क्लब पर भी आंदोलन हुए हैं, लेकिन मोदी-शाह फिलहाल इतने भयभीत हैं कि उन्होंने संसद भवन के पास स्थित `जंतर-मंतर’ को हमेशा के लिए बंद कर दिया। अब `जंतर-मंतर’ की सड़क पर गहरा सन्नाटा पसरा रहेगा। वहां धरने नहीं होंगे, जनता की आवाज नहीं होगी, मांगों के पोस्टर नहीं होंगे।
लोकतंत्र की आवाज बंद करने की
यह प्रक्रिया है। रामलीला मैदान संसद से ४ किलोमीटर, सीबीडी ग्राउंड १२ किलोमीटर और बुराड़ी २०-२१ किलोमीटर दूर है। `जंतर-मंतर’ के प्रदर्शनकारियों से मिलने कई सांसद और नेता जाया करते थे। नई अव्यवस्था के कारण अब यह संभव नहीं होगा। मोदी-शाह ने लोकतंत्र की आवाज को दिल्ली की सीमाओं से बाहर धकेल दिया है। एक भ्रष्ट, संविधान-विरोधी ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए मोदी-शाह ने यह प्रताप किया है। तानाशाह जब जनता से डरने लगता है, तब उसका अंत समय करीब आ जाता है, यही सत्य है। दिल्ली के बाहर आंदोलन करो, कहने वाले मोदी-शाह कौन होते हैं? शासक दिल्ली में आते हैं और जाते हैं। मोदी-शाह को भी जल्द ही जाना पड़ेगा। जब वे `विपक्ष’ में होंगे, तब उन्हें भी आंदोलन के लिए `बुराड़ी’ ही जाना पड़ेगा, इस बात का ध्यान तो उन्हें रखना ही चाहिए था। संविधान ने शांतिपूर्ण आंदोलन को संरक्षण दिया है। रामलीला मैदान पर अगले चार महीने की `बुकिंग’ है और यह मैदान भाजपा के रामकथा वाचकों ने पहले से ही बुक कर रखा है। रामलीला मैदान का किराया रोजाना डेढ़ लाख रुपए है। गरीब आंदोलनकारी इतना पैसा कहां से लाएंगे? `जंतर-मंतर’ पर कोई शुल्क नहीं था। अब व्यापारी मोदी-शाह ने विरोध की आवाज उठाने वालों पर लाखों का `जजिया’ कर लगा दिया है। मोदी के दौर में उनकी सरकार का विरोध करना खर्चीला और कठिन हो गया है। लोकतंत्र पर भी महंगाई की मार पड़ी है। `जंतर-मंतर’ जीवंत आंदोलनों का `स्मारक’ बन गया है। लोकतंत्र के एक प्रतीक को मोदी ने `स्मारक’ में तब्दील कर दिया। `जंतर-मंतर’ का यह स्मारक मोदी-शाह की तानाशाही मानसिकता की कब्र बनेगा। जाहिर है, `जंतर-मंतर’ खामोश नहीं होगा। मोदी-शाह को ही भागना पड़ेगा।

अन्य समाचार