मुख्यपृष्ठस्तंभपाकिस्तान में घोषित आपातकाल, हिंदुस्थान में अघोषित!

पाकिस्तान में घोषित आपातकाल, हिंदुस्थान में अघोषित!

अनिल तिवारी

भाई, लोकतंत्र भी गजब चीज है! पाकिस्तान में सरकार ने बाकायदा आपातकाल घोषित कर दिया और हिंदुस्थान में विपक्ष चिल्ला रहा है कि यहां बिना घोषणा के ही आपातकाल जैसे हालात हैं! उधर सरकारी मुहर, इधर सरकारी स्वार्थ! सवाल है, लोकतंत्र को आखिर इतनी पुलिस की जरूरत क्यों पड़ रही है?
रविवार को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लगाकर इमरान खान की पार्टी की प्रांतीय सरकार निलंबित कर दी। सरकारी दलील है कि आतंकवाद और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ चुकी थी। इमरान की पार्टी इसे लोकतांत्रिक जनादेश पर हमला बता रही है। यानी सत्ता का तर्क सुरक्षा, विपक्ष का सवाल लोकतंत्र!
इधर हिंदुस्थान में भी कमोबेश वही हालात हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे ने रविवार को आरोप लगाया कि हिंदुस्थान में अघोषित आपातकाल जैसे हालात पैदा किए जा रहे हैं। यहां भी लोकतंत्र पर हमला जारी है, सरकार खुद आतंक पैâला रही है। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की हिरासत और भारी पुलिस बंदोबस्त व ज्यादतियों पर सवाल उठ रहे हैं। अब देखिए! भाजपा प्रदर्शन को अराजकता पैâलाने की कोशिश बता रही है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई। पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। मगर भाई, लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को सुनना भी तो किसी की जिम्मेदारी होगी! सवाल अपनी जगह है, जनता प्रदर्शन करे तो बैरिकेड, विपक्ष सवाल करे तो अराजकता का आरोप! फिर संवाद किस खिड़की से होगा? लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि सरकार से असहमति जताई जा सकती है। यदि हर असहमति को खतरा समझा जाने लगे, तो भाई, लोकतंत्र मजबूत हो रहा है या सरकार का सुरक्षा घेरा?
लोकतंत्र बंधक नहीं बनेगा, मगर मेट्रो और सड़कें किसकी बपौती हैं?
अब देखिए, दिल्ली की सियासत में गजब का तमाशा! मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने फरमाया कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता विपक्ष की राजनीतिक सुविधा की बंधक नहीं बन सकती। बात तो सोलह आने खरी है! लेकिन उसी दिल्ली में पचासों मेट्रो स्टेशन बंद करके और तमाम सड़कों पर यातायात प्रतिबंध लगे तब? बताइए, लोकतंत्र बंधक नहीं बना क्या? लोकतंत्र बंधक नहीं बन सकता, लेकिन मुसाफिर बन सकता है?
मामला मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का है। विपक्ष चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगा रहा है। आयोग सामने आकर आरोपों को नकार दे, सबूत दे दे। बस, इतनी सी तो बात है। भाजपा कहती है कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला कर रहा है। अरे, सवाल पूछने से संस्था कमजोर होती है या सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलने से? भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी पर अराजकता और राजनीतिक अस्थिरता पैâलाने का आरोप लगाया। राहुल गांधी विपक्षी दलों के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च कर रहे थे। इसमें अराजकता कहां से आई, अराजकता तो पुलिस पैâला रही है, सरकार पैâला रही है। कमाल तो आगे हुआ! दिल्ली पुलिस ने ऐतिहासिक जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। तीन वैकल्पिक स्थान बताए गए हैं। अब आंदोलनकारियों को भी समझना पड़ेगा कि लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, मगर कहां करना है, यह प्रशासन तय करेगा! कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी अदालत का कामकाज बाधित न करने और शांतिपूर्ण विरोध की बात कही है, पर विपक्ष से मिलने से इनकार कर दिया। विपक्ष के नेता से मिलने को उनके पास समय नहीं था। असली उलटबांसी यही है। सत्ता लोकतंत्र की दुहाई दे रही है, सुप्रीम कोर्ट कन्नी काट रहा है, विपक्ष लोकतंत्र बचाने का रास्ता खोज रहा है और आम आदमी मेट्रो, रेल और सड़क पर खड़ा अपने भविष्य की मंजिल का रास्ता पूछ रहा है!

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