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नकली दवाओं के कारोबार पर लगेगी लगाम!

 -महाराष्ट्र में पहली बार अत्याधुनिक मशीनों से होगी संदिग्ध दवाओं की जांच -प्रत्येक मशीन की कीमत 1.20 करोड़ रुपए, तीन साल तक रख-रखाव की जिम्मेदारी कंपनी की

राजन पारकर / मुंबई

मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाली नकली और घटिया गुणवत्ता की दवाओं के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए महाराष्ट्र के स्वास्थ्य विभाग ने आधुनिक तकनीक का सहारा लेने की पहल की है। दवाओं में मौजूद रासायनिक घटकों की पहचान और उनकी प्राथमिक जांच के लिए अत्याधुनिक रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक पर आधारित TruScan RM मशीनों का उपयोग किया जाएगा। प्रत्येक मशीन की कीमत 1 करोड़ 20 लाख रुपये बताई गई है। इन मशीनों के रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित कंपनी अगले तीन वर्षों तक संभालेगी। स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने आज आयोजित पत्रकार परिषद में इस संबंध में जानकारी दी।
पैकिंग असली, लेकिन दवा नकली!
नकली दवाओं का कारोबार अब केवल साधारण नकल तक सीमित नहीं रह गया है। असली दवाओं जैसी पैकिंग, आकर्षक छपाई, रंग और होलोग्राम तैयार करके नकली उत्पादों को बाजार में उतारा जा रहा है। ऐसे में केवल दवा की पैकिंग देखकर उसकी असलियत पहचानना मुश्किल हो जाता है।
कई बार दवाओं में सक्रिय घटकों की मात्रा निर्धारित मानकों से कम होती है। कुछ दवाओं में गलत रासायनिक तत्व मिलाए जाते हैं, तो कहीं आवश्यक घटकों का अनुपात ही बिगाड़ दिया जाता है। अनुचित भंडारण अथवा अन्य कारणों से दवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा भी बना रहता है। ऐसी दवाएं मरीजों के उपचार को प्रभावित करने के साथ उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए दवाओं की बाहरी बनावट के बजाय उनके भीतर मौजूद रासायनिक घटकों की जांच करना आवश्यक है। नई तकनीक से संदिग्ध दवाओं की प्राथमिक छंटनी में मदद मिलेगी और जरूरत पड़ने पर उनके नमूनों को विस्तृत जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा जा सकेगा।
लेजर किरणों से होगी दवाओं की पहचान!
TruScan RM मशीन रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक पर आधारित है। इस तकनीक में दवा के नमूने पर लेजर किरण डाली जाती है। उससे बिखरने वाले प्रकाश का विश्लेषण करके संबंधित पदार्थ की आणविक संरचना से जुड़े विशिष्ट संकेत प्राप्त किए जाते हैं।
मशीन इन संकेतों की प्रमाणित संदर्भ नमूनों के साथ तुलना करके यह पहचानने में मदद करती है कि जांचा जा रहा पदार्थ अपेक्षित सामग्री से मेल खाता है या नहीं। इससे औषधि निरीक्षकों को संदिग्ध दवाओं की पहचान करने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, मशीन का परिणाम किसी दवा की संपूर्ण गुणवत्ता, प्रभावकारिता और सुरक्षा का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। सक्रिय घटकों की सटीक मात्रा तथा अन्य गुणवत्ता मानकों की पुष्टि के लिए आवश्यकता के अनुसार विस्तृत प्रयोगशाला जांच भी जरूरी है।
संदिग्ध नमूनों की होगी प्रयोगशाला जांच
दवाओं की जांच के दौरान सबसे पहले उनकी पैकिंग, लेबल और अन्य विवरणों की पड़ताल की जाएगी। संदेह होने पर नमूने को मशीन से जांचा जा सकेगा। यदि परिणाम स्पष्ट नहीं होता है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दोबारा जांच की जा सकती है।
इसके बावजूद संदेह बना रहने अथवा नमूना निर्धारित मानकों से मेल नहीं खाने पर उसे नियमानुसार सीलबंद करके अधिकृत प्रयोगशाला में भेजना महत्वपूर्ण होगा। वहां उच्चस्तरीय जांच के लिए एचपीएलसी (HPLC) और जीसी (GC) जैसी विश्लेषण तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में नमूने की पहचान, जांच रिपोर्ट और नमूने को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना भी जरूरी है, ताकि आगे की कानूनी कार्रवाई के दौरान जांच की विश्वसनीयता बनी रहे।
1.20 करोड़ की मशीन, जवाबदेही भी हो तय!
प्रत्येक मशीन पर 1 करोड़ 20 लाख रुपये खर्च किए जाने की जानकारी के बीच इस निवेश से मिलने वाले वास्तविक लाभ पर भी नजर रहेगी। अगले तीन वर्षों तक कंपनी द्वारा रखरखाव की जिम्मेदारी संभालना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके बाद मशीनों के रखरखाव, मरम्मत, तकनीकी सहायता और नियमित गुणवत्ता परीक्षण की व्यवस्था भी स्पष्ट होनी चाहिए।
इसके साथ ही कई सवालों के जवाब मिलना आवश्यक है। ये मशीनें राज्य में किन-किन स्थानों पर तैनात की जाएंगी? कितने औषधि निरीक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा? प्रतिमाह कितनी दवाओं के नमूनों की जांच होगी? संदिग्ध दवाएं मिलने पर संबंधित विक्रेताओं, वितरकों और निर्माताओं के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब ही बताएगा कि यह पहल केवल आधुनिक मशीनों की खरीद तक सीमित रहती है या वास्तव में दवा माफिया के खिलाफ प्रभावी अभियान में बदलती है।
मशीनों से आगे बढ़े, कार्रवाई का अभियान!
नकली दवाओं का कारोबार केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। महंगी मशीनें खरीदना अपने आप में सफलता नहीं है। उनका नियमित उपयोग, औषधि निरीक्षण की प्रभावी व्यवस्था, दवा विक्रेताओं और वितरकों की जांच, प्रयोगशाला से समय पर रिपोर्ट तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।
दवा के पैकेट पर दर्ज नाम और उसके भीतर मौजूद वास्तविक घटकों में अंतर होने का खामियाजा आखिरकार मरीज को भुगतना पड़ सकता है। ऐसे में नई तकनीक महाराष्ट्र में नकली और घटिया दवाओं के खिलाफ कार्रवाई को गति देने में सहायक साबित हो सकती है।
अब असली परीक्षा स्वास्थ्य विभाग की है। मशीनों की कीमत करोड़ों में है, लेकिन उनकी सफलता का मूल्यांकन इस बात से होगा कि कितनी संदिग्ध दवाओं का पर्दाफाश होता है, कितने दोषियों पर कार्रवाई होती है और मरीजों को सुरक्षित दवाएं उपलब्ध कराने में कितनी मदद मिलती है।

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