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सुल्तानपुरिया चटर-पटर (४) : सुल्तानपुर-बस्ती की अनूठी परंपरा…नवरात्र खत्म होने पर शुरू होती है दुर्गापूजा!

-दो स्वर्णकार दोस्तों ने साढ़े छह दशक पूर्व दोनों जिलों में की थी ये बेढब शुरुआत

विक्रम बृजेंद्र सिंह

आम तौर पर देश-दुनिया में जहां पर भी हिंदू आबादी है वहां शारदीय नवरात्र में ही प्रथम दिवस देवी दुर्गा की प्रतिमाओं की स्थापना कर नौ दिन तक पूजा अर्चना का विधान सर्वत्र व्याप्त है। यूपी और बंगाल, बिहार और ओडिसा आदि राज्यों में भी उसी वर्षों पुरानी रवायत के हिसाब से दुर्गा भक्त नौ दिन पूजा के साथ इन प्रतिमाओं का दशमी यानि दशहरे के दिन निकटवर्ती नदी या तालाब में शास्त्रसम्मत ढंग से विसर्जन करते हैं। ..लेकिन आपस में रिश्तेदार पेशे से स्वर्णकार दो दोस्तों ने सुल्तानपुर और बस्ती जिलों में करीब ६६-६७ वर्ष पूर्व इस परंपरागत दुर्गापूजा की विधा को ही बदल डाला। नवरात्र के नौ दिन प्रतिमा स्थापना कर पूजा अर्चना कर दशहरे को प्रतिमा विसर्जन के बजाय इन दोनों शहरों की अष्टमी तिथि को प्रतिमा स्थापना कर छह दिन बाद शरद पूर्णिमा को प्रतिमा विसर्जन की अनूठी रवायत अब देश भर में मशहूर हो चुकी है। भिखारीलाल सोनी सुल्तानपुर शहर के ठठेरी बाजार व कन्हैय्यालाल सोनी बस्ती शहर के मंगल बाजार के निवासी थे। दोस्त भी थे दोनों और रिश्तेदार भी। स्व.कन्हैयालाल सोनी के पौत्र अनुराग सोनी व विपुल सोनी इसकी पुष्टि करते हैं। आज भी उस परंपरा को बस्ती में आगे बढ़ा रहे दोनों भाई बताते हैं कि शुरुआत की सुल्तानपुर में भिखारी लाल जी ने सन १९५९ में। सुल्तानपुर के ठठेरी बाजार में उन्होंने सबसे पहले दुर्गाजी की मूर्ति स्थापना कर पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा के दिन गोमती नदी में विसर्जन की शुरुआत की। उन्हीं के नक्शेकदम पर अगले साल सन १९६० में बस्ती के मंगल बाजार में मेरे बाबा कन्हैय्यालाल जी देवी पूजा का नवरात्र की अष्टमी तिथि पर श्रीगणेश किया। सुल्तानपुर के सीताकुंड घाट पर गोमती नदी में व बस्ती के अमहट घाट पर कुँवानो नदी में विसर्जन की परंपरा तभी से चली आ रही है। अब दोनों शहरों में एक ही पैटर्न पर देवी दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की करीब साढ़े सात सौ या उससे भी अधिक पंडालों में जगह-जगह स्थापना-पूजन और नदी में विसर्जन होता चला आ रहा है। हालांकि पूर्ववर्ती धार्मिक मान्यताओं के विपरीत इस नई (अनूठी) रवायत की कोई ठोस वजह दोनों जिलों के संस्थापकों के मौजूदा उत्तराधिकारी नहीं बता पाते। अलबत्ता ये अवश्य कहते हैं कि नवरात्र में व्रत-उपवास और अनुष्ठान के कारण महोत्सव के रूप में दुर्गा पूजा में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण विद्वज्जनों की राय लेकर नए स्वरूप मेंअष्टमी तिथि को प्रतिमा स्थापना कर शरद पूर्णिमा को विसर्जन की परंपरा शुरू हुई होगी। बस्ती में तो इस देवी पूजा को दशहरा मेला ही कहा जाता है। वहीं सुल्तानपुर में इसे दुर्गापूजा महोत्सव कहा जाता है। भव्य पंडाल और भावपूर्ण मुखमंडल वाली देवी प्रतिमाएं इसका आकर्षण होती हैं। इनके अलावा नई पीढ़ी के मध्य सामाजिक संगठनों की ओर से अनवरत भंडारे की नई परंपरा भी मेले के दौरान काफी आगे बढ़ चुकी है।

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