-मोदी-शाह की ‘शेयर खरीदो’ सलाह, एग्जिट पोल की तेजी और नतीजों के दिन तबाही; दो साल बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव २०२४ के परिणाम से जुड़ी शेयर बाजार की ऐतिहासिक उठापटक पर राहुल गांधी की पुरानी प्रेस कॉन्प्रâेंस फिर चर्चा में है। लेकिन इस बार असली प्रश्न आरोपों से आगे का है, बाजार नियामक सेबी ने तीन और चार जून के संदिग्ध कारोबारी पैटर्न की क्या जांच की और उसका निष्कर्ष कहां है?
एक जून को आए एग्जिट पोल में राजग की प्रचंड जीत का अनुमान लगाया गया। अगले कारोबारी दिन तीन जून को सेंसेक्स २,५०७ अंक और निफ्टी ७३३ अंक उछल गया। चार जून को वास्तविक परिणाम अनुमान से अलग आते ही सेंसेक्स ४,३८९ अंक तथा निफ्टी १,३७९ अंक टूट गया। कारोबार के दौरान सूचीबद्ध कंपनियों की बाजार संपत्ति करीब ३० लाख करोड़ रुपए तक घट गई थी। राहुल गांधी ने छह जून २०२४ को इसे ‘सबसे बड़ा शेयर बाजार घोटाला’ बताते हुए पूछा था कि एग्जिट पोल से पहले किन घरेलू और विदेशी निवेशकों ने बड़े सौदे किए तथा तेजी के बाद किसने मुनाफा काटा? उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनाव परिणाम से पहले शेयर खरीदने संबंधी टिप्पणियों पर भी सवाल उठाया था। भाजपा ने आरोपों को निराधार बताया था।
उस समय समाचार रिपोर्टों में सेबी द्वारा कारोबारी गतिविधियों की पड़ताल किए जाने की बात सामने आई, लेकिन अब तक ऐसी कोई विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट, अंतिम आदेश या आधिकारिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है, जिससे पता चले कि जांच किस दायरे में हुई और क्या सामने आया। इसलिए यह दावा भी नहीं किया जा सकता कि घोटाला सिद्ध हुआ अथवा सेबी ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया। सवाल सीधा है, यदि जांच हुई तो रिपोर्ट कहां है, और यदि नहीं हुई तो इतनी असाधारण उठापटक को सामान्य मानकर क्यों छोड़ दिया गया?
सेबी को क्या जांचना था?
◆ एग्जिट पोल से पहले के नकद और वायदा सौदे
◆ असामान्य खरीद-बिक्री करने वाले बड़े खातों की पहचान
◆ विदेशी संस्थागत निवेशकों के सौदों का समय
◆ एग्जिट पोल की अप्रकाशित जानकारी के इस्तेमाल की आशंका
◆ तीन जून की तेजी में खरीद और चार जून की गिरावट से पहले निकासी
◆ राजनीतिक व्यक्तियों, मीडिया संस्थानों और कारोबारी खातों के संभावित संबंध
◆ जांच हुई तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक न करने का कारण
