मुख्यपृष्ठसमाचार‘न्याय’ के दरवाजे पर ही डिजिटल ताला!

‘न्याय’ के दरवाजे पर ही डिजिटल ताला!

-मुंबई हाईकोर्ट की ऑनलाइन प्रणाली पर उठे सवाल, रजिस्ट्रार को लिखित शिकायतों के बाद भी समाधान नहीं

सामना संवाददाता / मुंबई

देशभर में न्यायपालिका को डिजिटल बनाने, ई-फाइलिंग को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देने और पेपरलेस कोर्ट व्यवस्था लागू करने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय लगातार जोर दे रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित उच्च न्यायालयों में शामिल मुंबई हाईकोर्ट की ऑनलाइन प्रणाली बार-बार ठप पड़ने से वकीलों, वादकारियों और पूरी न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अनेक अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को लिखित शिकायतें देकर स्थायी समाधान की मांग की है। इसके बावजूद अब तक कोई प्रभावी व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है। परिणामस्वरूप, हर दिन सैकड़ों वकीलों को तकनीकी खामियों का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप ई-फाइलिंग अब न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। लेकिन जब सर्वर बार-बार बैठ जाए, पोर्टल लॉगिन न हो, दस्तावेज़ अपलोड न हों, फीस जमा न हो सके या फाइल सबमिट ही न हो पाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर डिजिटल न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
सबसे बड़ी मुश्किल वकीलों के सामने यह है कि वे अपने मुवक्किलों को क्या जवाब दें? केस पूरी तरह तैयार होने के बावजूद यदि केवल पोर्टल बंद होने के कारण समय पर फाइलिंग न हो सके, तो उसका ठीकरा आखिर किसके सिर फोड़ा जाए? तकनीकी विफलता का बोझ अधिवक्ताओं और मुवक्किलों पर डालना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
न्याय तक पहुँच पर भी असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तकनीकी खामियों के कारण समय पर याचिका दाखिल नहीं हो पाती, तो इसका असर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत विकसित समय पर न्याय पाने के अधिकार पर भी पड़ सकता है। न्याय तक सरल और प्रभावी पहुँच लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। यदि डिजिटल व्यवस्था ही बाधा बन जाए, तो सुधार का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
वकीलों की प्रमुख मांगें
अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट प्रशासन से मांग की है कि सर्वर क्षमता तत्काल बढ़ाई जाए, अत्याधुनिक आईटी ढांचा विकसित किया जाए, 24×7 तकनीकी सहायता केंद्र शुरू किया जाए, सिस्टम मेंटेनेंस की पूर्व सूचना दी जाए तथा तकनीकी खराबी की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, ताकि न्यायिक कार्य प्रभावित न हो।
डिजिटल न्याय व्यवस्था केवल घोषणा नहीं, मजबूत व्यवस्था भी चाहिए
डिजिटल कोर्ट आज समय की आवश्यकता है, लेकिन केवल ऑनलाइन पोर्टल बना देने से न्याय व्यवस्था डिजिटल नहीं हो जाती। इसके लिए मजबूत तकनीकी ढांचा, निर्बाध सर्वर, प्रभावी निगरानी और जवाबदेह प्रशासन भी उतना ही आवश्यक है।
आज सवाल केवल वेबसाइट का नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के न्याय तक समय पर पहुँचने का है। न्यायालय के द्वार पर यदि “सर्वर एरर” खड़ा हो जाए, तो न्याय की रफ्तार स्वतः थम जाती है। अब समय आ गया है कि इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकालकर डिजिटल न्याय व्यवस्था को वास्तव में भरोसेमंद बनाया जाए।

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