सामना संवाददाता / मुंबई
क्या मुंबई और ठाणे की हरियाली को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने का ‘डेथ वारंट’ साइन हो चुका है? क्या आपके बच्चों के हिस्से की शुद्ध हवा को चंद रसूखदार बिल्डरों और भ्रष्ट तंत्र ने मिलकर बेच डाला है? एक ऐसी सनसनीखेज हकीकत सामने आई है, जिसे सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी!
सूत्रों के मुताबिक, मुंबई और उसके आसपास की सरकारी जमीनें, म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की प्रॉपर्टी, पब्लिक पार्क और फेफड़ों को ऑक्सीजन देने वाली वन विभाग की जमीनों पर ‘भू-माफियाओं’ की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है। चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि ठाणे के चितळसर-मानपाडा इलाके में संजय गांधी नेशनल पार्क की १९३ एकड़ की बेशकीमती सुरक्षा दीवार को ढहाने की तैयारी है।
२,८०० करोड़ का ‘गुपचुप’ खेल!
सुप्रीम कोर्ट के एक पैâसले की आड़ में पर्दे के पीछे एक ऐसा खेल खेला गया है, जिसकी कीमत २,८०० करोड़ रुपए बताई जा रही है! जी हां, पूरे २,८०० करोड़ का टीडीआर (ट्रांसफर ऑफ डेवलपमेंट राइट्स) बड़े-बड़े कॉर्पोरेट बिल्डरों की झोली में डाल दिया गया है! वन विभाग और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की नाक के नीचे, पर्यावरण के लिए आरक्षित १०० एकड़ जमीन को कंक्रीट का जंगल बनाने का रास्ता साफ कर दिया गया है। सोचिए! आरे कॉलोनी पहले ही आधी उजाड़ी जा चुकी है, मेट्रो शेड के नाम पर पेड़ कट चुके हैं। अब गोरेगांव, मुलुंड, भांडुप और घोडबंदर के पहाड़ों को चीरकर, खाड़ियों को पाटकर वहां आलीशान टाउनशिप और कंक्रीट की इमारतें खड़ी करने की महा-साजिश रची जा रही है। तापमान ४० पार… क्या हम जलने के लिए तैयार हैं? मुंबई-ठाणे का पारा आज ४० डिग्री छू रहा है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि विकास के नाम पर बुलेट ट्रेन, रिंग रोड और अंधाधुंध कंस्ट्रक्शन की मानव-निर्मित त्रासदी है। आरोप है कि चुनावी चंदे (इलेक्टोरल बॉन्ड) और बड़े फंड्स के दम पर सत्ता और सिस्टम के रक्षक ही अब भक्षक बन चुके हैं!
