मुख्यपृष्ठस्तंभन्याय के बुनियादी सिद्धांतों पर मंडराता खतरा

न्याय के बुनियादी सिद्धांतों पर मंडराता खतरा

‘फेसलेस ट्रायल’

संतोषी रावत

हाल ही में जर्मनी के बॉन शहर में बीएनएम, घठमच ‘बलूच नेशनल मूवमेंट’ द्वारा एक विरोध मार्च निकाला गया। इस प्रदर्शन में बलूचिस्तान में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों के साथ-साथ बलूच नेताओं के खिलाफ चल रही कथित ‘फेसलेस ट्रायल’ से प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। प्रदर्शनकारियों ने इसे मौलिक मानवाधिकारों और पारदर्शी न्याय प्रणाली का खुला उल्लंघन बताया है। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि ‘फेसलेस ट्रायल’ क्या है और यह आधुनिक न्याय व्यवस्था के लिए कितनी बड़ी चुनौती है।
क्या होता है ‘फेसलेस ट्रायल’?
साधारण शब्दों में कहें तो ‘फेसलेस ट्रायल’ एक ऐसी न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें गवाहों, जांचकर्ताओं या कभी-कभी न्यायाधीशों की पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा जाता है। इस व्यवस्था में आरोपी या उसके वकील को यह जानने का अधिकार नहीं होता कि उनके खिलाफ गवाही देने वाला व्यक्ति कौन है। आमतौर पर सरकारें या सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद, संगठित अपराध या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों में गवाहों की सुरक्षा का हवाला देकर इस प्रक्रिया का सहारा लेती हैं।
न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ क्यों?
वैश्विक मानवाधिकार कानूनों और लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था का यह बुनियादी नियम है कि हर आरोपी को ‘फेयर ट्रायल’ (निष्पक्ष सुनवाई) का अधिकार मिलना चाहिए। इसमें आरोपी को अपने खिलाफ लगे आरोपों और गवाहों का सामना करने यानी राइट टू क्रॉस एग्जामिन की आजादी होती है। जब कोई ट्रायल ‘फेसलेस’ हो जाता है, तो न्याय की बुनियाद ही हिल जाती है।
सत्यता की जांच असंभव: यदि आरोपी को पता ही नहीं होगा कि गवाह कौन है, तो वह यह वैâसे साबित करेगा कि गवाह व्यक्तिगत दुश्मनी, राजनीतिक दबाव या किसी पूर्वाग्रह के तहत झूठी गवाही दे रहा है।
सत्ता का दुरुपयोग: ऐसी गुप्त प्रक्रियाओं में सेना या सरकार विरोधी आवाजों को दबाने के लिए फर्जी मामले बनाना बेहद आसान हो जाता है, जैसा कि बलूचिस्तान के कार्यकर्ताओं के मामलों में आरोप लग रहे हैं।
पारदर्शिता का अभाव: न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। गोपनीयता जब जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है, तो वह न्याय के बजाय दमन का रूप ले लेती है।
निष्कर्ष
गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके लिए आरोपी के बुनियादी कानूनी अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार नियमों के अनुसार, किसी भी लोकतांत्रिक समाज में ‘फेसलेस ट्रायल’ को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बलूच प्रदर्शनकारियों की यह मांग अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक जरूरी बहस को जन्म देती है कि सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाना कितना अनिवार्य है। बिना पारदर्शिता के दिया गया पैâसला न्याय नहीं, बल्कि कानून की आड़ में किया गया दमन बन जाता है।

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