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शेयरों के बाद सरकारी बॉन्ड से भी विदेशी पैसा फरार!; सितंबर में `९,१९२ करोड़ निकाले, पांच महीने की खरीदारी थमी; रुपए और सरकारी उधारी पर बढ़ेगा दबाव

सामना संवाददाता / मुंबई
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पूंजी की लगातार निकासी के बाद अब सरकारी बॉन्ड बाजार ने भी खतरे की घंटी बजा दी है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने सितंबर में ‘पूर्णत: सुलभ मार्ग’ यानी एफएआर के तहत आने वाले सरकारी बॉन्ड से शुद्ध ९,१९२ करोड़ रुपए निकाल लिए। इससे लगातार पांच महीने से जारी खरीदारी का सिलसिला टूट गया। यह मार्च के बाद सरकारी प्रतिभूतियों में पहली मासिक शुद्ध बिकवाली है।
मार्च में विदेशी निवेशकों ने १७,६८८ करोड़ रुपए निकाले थे। अप्रैल से अगस्त के बीच उन्होंने एफएआर बॉन्ड में कुल ६०,३३२ करोड़ रुपए लगाए थे। जून में रिकॉर्ड ४१,७७४ करोड़ रुपए का निवेश आया, लेकिन जुलाई में खरीद घटकर ७,५८१ करोड़ रुपए और अगस्त में महज २०३ करोड़ रुपए रह गई। सितंबर में प्रवाह पूरी तरह पलट गया।
इस बिकवाली के पीछे पश्चिम एशिया का तनाव, १०५ डॉलर के ऊपर बना ब्रेंट क्रूड, अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में तेजी और रुपए की कमजोरी प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। महंगा तेल भारत का आयात बिल और महंगाई बढ़ाता है, जबकि अमेरिका में ऊंचा प्रतिफल विदेशी निवेशकों को भारतीय ऋण बाजार से पैसा निकालने के लिए प्रेरित करता है। चिंता केवल ९,१९२ करोड़ रुपए की निकासी की नहीं है। सरकारी बॉन्ड की मांग घटने पर उनकी कीमत गिरती और प्रतिफल बढ़ता है। इसका अर्थ है कि सरकार को भविष्य में कर्ज उठाने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ सकता है। इसका असर कॉरपोरेट ऋण, बैंक कर्ज और आम उपभोक्ता की ब्याज लागत तक पहुंच सकता है।
रुपए पर भी दोहरा दबाव बनता है कि विदेशी निवेशक बॉन्ड बेचकर डॉलर खरीदते हैं और महंगे तेल के लिए पहले ही डॉलर की मांग बढ़ी हुई है। शेयर और सरकारी बॉन्ड, दोनों बाजारों से विदेशी पैसा निकलना बता रहा है कि वैश्विक निवेशक फिलहाल भारत के जोखिम को लेकर सतर्क हो गए हैं।

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