एड. राजीव मिश्र, मुंबई
एक बार धरती के एक बहुत बड़हर नेता जी के प्राण पखेरू उड़ि गए। थोड़ी देर बाद जब नेता जी के आंख खुली, तो सामने यमलोक का दरबार लागि है। नेता जी चारों ओर ताके अउर बोले -‘अरे! ई कौन जगह आय गएं ? इहां न तो कतहुं भीड़ है न कतहुं मीडिया है अउर हमका माला पहिनावे वाले चमचा काहे नहीं देखाइ परत हैं?’ अचानक नेताजी के नाम के पुकार भई। नेताजी अंदर गए तो चित्रगुप्त रजिस्टर खोलिके बोले, ‘महाराज, ई धरती वाले नेता हैं। इनके कर्मन का हिसाब देखाय जाय।’ नेता जी तुरते बोले, ‘पहिले हमार परिचय सुनौ। हम पांच बेर विधायक, दू बेर मंत्री अउर एक बेर गठबंधन सरकार के किंगमेकर रहि चुके हैं।’ चित्रगुप्त बोले – सीधे खड़े रहो अउर ‘हमका पद नही आपन करम बतावा।’ नेता जी मुस्कुराए-‘करम? अरे भइया, करम त जनता करत रही, हम त बस ओहिकर उद्घाटन करत रहेन!’ यमराज जी ई सुनिके माथा पकड़ि लिहिन। चित्रगुप्त फिरि से हिसाब पढ़े लागे, ‘पहिले चुनाव मा सड़क बनवाय के वादा, दुसरे चुनाव मा अस्पताल, तीसरे मा बेरोजगारी दूर करै के वादा, पर इ लफ्फाज अदमी एक भी वादा नहीं पूरा किहिस’। नेता जी बीचै मा बोले, ‘अरे, पूरा बकलोलय हौ का? वादा पूरा होइ गवा होत त अगिला चुनाव का कहि के लड़ित ?’ यमराज जी बोले ‘अब चुप रहौ। तुमका नरक भेजा जाय कि सरग, ई फैसला होइ रहा है।’ नेता जी चारों तरफ देखिन। अचानक उनकी नजर यमराज के सिंहासन पर पड़ी। आंख चमक उठी। ‘ई सिंहासन खाली काहे पड़ा है?’ यमराज बोले, ‘खाली कहां? हम बैठे हैं।’ नेता जी बोले, केतने दिन से बइठे हौ ? जब से ई सृष्टि है तब से….. मतलब बहुत दिन से बइठे हो। अब सत्ता परिवर्तन जरूरी है।’ इतना कहिके नेता जी सीधे सिंहासन की तरफ बढ़े अउर बोले ‘हमका जनता चुनि के भेजिस अहइ। यमराज गरजिन ‘हमरे सिंहासन पर कब्जा करिहौ?’ नेता जी बोले, ‘कब्जा नहीं महाराज, लोकतांत्रिक पुनर्गठन!’ यमराज जइसनै गदा उठाये नेता जी तुरते हाथ जोड़िके गोड़ मा गिरि गए, दोहाई हो महाराज की…. ‘महराज, गलती होइ गई। हमका नरक न भेजो।’ कुछ देर सोचय के बाद यमराज चित्रगुप्त से बोले, ‘यहिका नरक मा भेजय में भी खतरा अहइ। उहां के सब पापी भी चुनाव लड़े सीखि जइहैं!’ चित्रगुप्त बोले, तो ‘महाराज, फिर का किया जाय?’ यमराज हसिन अउर चित्रगुप्त से बोले यहिका वापस धरती पर भेज दो।’ नेता जी खुश होइ गए, सचमुच?’ यमराज बोले, ‘हां, लेकिन यहि बेर नेता बनिके नहीं जनता बनिके जइहौ।’ इहै तुम्हरा राजनीतिक मोक्ष अहइ।
