मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : सावन के नशा

अवधी व्यंग्य : सावन के नशा

एड. राजीव मिश्र, मुंबई

जब से बरखा के मौसम शुरू भवा है तब से मनई से लइके मेहरारू, सिवान से लइके चौपाल तक चारिउ ओर माटी के महक के साथ-साथ अलगय नशा चढ़ि गवा अहइ। बाग बगइचा, खेत कियारी जहां देखो उहां हरियाली ही हरियाली मुस्कियाय रही है। यहि हरियाली मा हरिया के ऊपर भी सावन के नशा चढ़य लगा है। वइसे तो लगभग कुलि गांव में एक सदाबहार छिछोरा होबय करत हैं। अउर वहि छिछोरा के कउनउ न कउनउ सपना के रानी रहबै करत है अब ई अलग बात है कि उ सपना के रानी सच्ची के भी होइ सकत है अउर खयाली भी। अइसने एक छिछोरा महमूदपुर में असलम भाई रहें। जितने मनई से बात करय उतनी गर्लप्रâेंड के नाम लय। आज सुबह-सुबह असलम भाई के लगे जावेद भाई पहुंचे, अउर असलम से पूछे, का चचा केहिके याद मा डूबा अहा… चचा हे चचा। का है रे काहें चिचियात है? अरे हम पुछित है केकरे याद में अइसन गुम हौ कि समने खड़ा मनई नही देखात है। पहिले तो एक बात सुनो जावेद, ई बार-बार चचा कहय छोड़ि देव, तुम्हारे बाप से दुइ साल छोट अही। तो का कही? हां ठीक है, चलो अब बताओ का भवा। अइसा है जावेद, कल बजार मा एक सुंदर लड़की मिली रही। जब हम ओहिका नजर भरिके देखे उहौ हमका नजर भरिके देखेस पर यहिके पहिले कि हम अपने दिल के बात ओहिसे कहि सकी उ मुस्की मारिके चल दिहिस। आज उ फिरि से बिसारती बजार में मिली तो हमहूं लपक के ओहिके पास पहुंचि गए। हमय देखतै उ हमरी ओर अइसन मुस्कान मारिस कि करेजा में मानों कउनउ कटारी कच्च से ओलियाय गय होय। फिर का भवा? फिर उ अपने सिंगार पटार के सब समान लिहे के बाद हमसे कहिस, सुनो जी, तुम्हरे पास पांच सौ रुपिया होय तो ई दुकान वाले भइया के देई देव, इहां हमरे मोबाइल में नेटवर्क नही है बाहर निकालतय हम तुमका गुगलपे कइ देबय। भइया कल अपने शौहर के साथ मिली तो ओहिसे कहिस, ई जुम्मन चचा हैं इनका सलाम करो। पर ई जुम्मन चचा कउन है? वही सोच में तो हम बिहानय से डूबे हैं कि हमसे ओहिके बीच में ई ससुरा जुम्मन कब आइ गवा। पूरी बात सुनय के बाद जावेद भाई के चक्कर आइ गवा और उही भहराय के गिरि पड़े।

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