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बेबाक : नया साल और महंगाई का हाल! …हर मोर्चे पर चूकी केंद्र सरकार

अनिल तिवारी- निवासी संपादक

नया साल २०२२ शुरू हो चुका है और साल का पहला महीना तकरीबन खत्म होने को है। हो सकता है इस नए साल में अब तक आपको कोई दिक्कत पेश न आई हो पर केंद्र सरकार के कुछ पैâसलों और कुछ लचर नीतियों का व्यापक असर आनेवाले महीनों में आपके जीवन पर पड़ सकता है, आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को कठिन कर सकता है और आपको बढ़ती महंगाई व घटते संसाधनों से जूझने को मजबूर कर सकता है। जिससे आप पिछले साल भर से वैसे ही जूझ भी रहे हैं। हालांकि, अब अंदेशा यह है कि आनेवाला वक्त और भी कठिन हो सकता है।

इस साल की शुरुआत में भले ही ओमायक्रॉन के संक्रमण से देशवासियों को राहत महसूस हो रही हो पर इस साल महंगाई से राहत के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। दरअसल, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के परिणाम घोषित होने के एक दिन बाद ही देश की एक सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी ने केंद्र सरकार से मुद्रास्फीति पर नजर रखने का अनुरोध किया था, क्योंकि उस वक्त तक कच्चा तेल उस स्तर तक पहुंच गया था जो वर्ष २०१४ में दर्ज हुआ था। तब तक कृषि जिंसों और धातुओं की कीमतों में तेजी आने से कॉर्पोरेट मुनाफा तेजी से प्रभावित होने लगा था। एफएमजीसी, इस्पात और सीमेंट समेत सभी सेगमेंट की कंपनियां कीमतों में वृद्धि और लागत नियंत्रण उपायों के बावजूद, मार्जिन पर दबाव महसूस कर रही थीं। परंतु केंद्र सरकार ने समय रहते कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया। नतीजा यह हुआ कि इस साल की शुरुआत में ही कंज्यूमर प्रोडक्ट जैसे एसी, प्रिâज और वॉशिंग मशीनों की कीमतों में ५ से १० फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली, जो आनेवाले वक्त में भी जारी रहेगी। इसके पीछे का कारण कच्चे माल और माल ढुलाई में बढ़ोतरी को बताया जा रहा है। वर्ष २०२२ की शुरुआत होते ही पैनासोनिक, एलजी और हायर समेत कई ब्रांड अपने प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ा चुके हैं, जबकि सोनी, हिताची और गोदरेज अप्लायंसेज क्वार्टर के अंत तक कीमतों में वृद्धि का निर्णय ले सकते हैं। असल में कंपनियां पिछले वर्ष बढ़ती कीमतों का बोझ पूरी तरह से ग्राहकों पर नहीं डाल पाई थीं, क्योंकि बाजार में मांग कमजोर थी। खासकर, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को इसका काफी बोझ उठाना पड़ा था।

पिछले साल भर टमाटर से लेकर खाद्य तेल, धान, गेहूं, चना, सरसों, सोयाबीन, मूंग और उससे बने उत्पादों पर मूल्य वृद्धि का दबाव बना रहा है। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की ही तरह कंज्यूमर प्रोडक्ट मार्वेâट समेत सभी सेगमेंट पर कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि का बोझ पड़ा है, माल ढुलाई में वृद्धि की मार पड़ी है और इसका सबसे बड़ा कारण है देश में अनियंत्रित रहे पेट्रोल और डीजल के दाम। पेट्रोलियम पदार्थों के अलावा कृषि बाजार को, किसी ने बुरी तरह से प्रभावित किया तो कोरोना महामारी और प्राकृतिक तौर पर मौसम चक्र में आए बदलाव व बेमौसम बारिश ने। साथ ही साथ कृषि कानूनों पर चले लंबे विरोध प्रदर्शन ने भी किसानों को कृषि पर ध्यान केंद्रित करने से बाधित किया और जब तक कृषि कानूनों का मसला हल हुआ, तब तक रबी की फसलों पर कड़ाके की ठंड, बरसते पानी और ओलों की बौछार ने कहर बरपा दिया। जिसका असर आलू, सरसों, मसूर, चना, मटर और ठंड में पैदा होनेवाले खाद्यान्नों पर बुरी तरह से पड़ रहा है। असल में फल-सब्जियों, खाद्यान्न व तेल की कीमतों में वृद्धि पिछले त्योहारी सीजन से ही देखने को मिल रहा है। इस पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने खाद्यान्न निर्यात और वायदा कारोबार पर रचनात्मक पाबंदियां, चुनिंदा खाद्य पदार्थों पर शून्य आयात शुल्क, सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा दाल और चीनी के आयात की अनुमति और पीडीएस के माध्यम से आयातित दालों और खाद्य तेलों का वितरण किया, पर इन सभी प्रयासों का महंगाई पर नियंत्रण में कोई सकारात्मक असर नहीं दिखा। नतीजा यह हुआ कि खाद्य महंगाई ८.६४ प्रतिशत से बढ़कर ९.५ प्रतिशत हो गई और खाद्य और र्इंधन उच्च मुद्रास्फीति ने देश में थोक मूल्य सूचकांक को नवंबर २०२१ में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया, जो नवंबर में पिछले एक दशक से ज्यादा के उच्चतम स्तर १४.२३ प्रतिशत तक पहुंच चुकी थी। इस महंगाई की सबसे ज्यादा मार देश के गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ी है। उनके लिए दाल, चावल, तेल, आटा और रोजमर्रा की सब्जियां तक खरीदना दूभर हो गया है। इन सबके बीच एक ओर चीनी का उत्पादन घटा है तो दूसरी ओर दूध की आपूर्ति भी घट गई है। अनुमान है कि चालू वर्ष २०२१-२२ में चीनी का उत्पादन २.१८ प्रतिशत घटकर ३.०५ करोड़ टन ही रहेगा। जहां तक दुग्ध उत्पादन का सवाल है तो इस सीजन में दूध की आपूर्ति पिछले साल की तुलना में २० से २५ फीसदी कम हो रही है। जिसका सीधा असर दूध की दरों पर भी पड़ रहा है। इसके अलावा दूध की उत्पादन लागत में भी ५ से १० प्रतिशत की वृद्धि से ग्राहकों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, जो इस वर्ष में और भी बढ़ने के आसार हैं।

वर्ष २०२१ की विदाई के वक्त ही देश के आर्थिक हालात नाजुक दौर में हैं। लोग महंगाई से परेशान हैं और कोरोना के नए वैरिएंट ओमायक्रॉन की दहशत ने अर्थचक्र को बुरी तरह से प्रभावित किया है। अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि ओमायक्रॉन की वजह से पहले के अनुमान की तुलना में अब आर्थिक वृद्धि के आंकड़े कमजोर रहने की प्रबल संभावना है। जिसका जोखिम आम जनजीवन से लेकर सभी सेक्टर पर देखने को मिल सकता है। रिजर्व बैंक द्वारा जारी मुद्रास्फीति की दर के आधार पर २०२१-२२ में महंगाई दर ६ फीसदी के करीब रहने का अनुमान है, जो काफी चिंताजनक स्थिति कही जा सकती है। जिसके इस वर्ष भर गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। दरअसल, अर्थशास्त्रियों ने पहले ही अनुमान लगा लिया था कि पिछले २ वर्षों की तुलना में नया वर्ष यानी २०२२, अधिक जोखिम भरा होगा। इसका कारण मुद्रास्फीति और उपभोग की मांग में मौद्रिक नीति के सामान्य होने की चिंताओं को बताया जा रहा था। अनुमान यह भी लगाया जा रहा था, बल्कि सर्वेक्षण तक बता रहे हैं कि देश में ८० प्रतिशत से अधिक परिवार बड़े खर्च करने के इच्छुक नहीं हैं। लोकल सर्कल द्वारा ४७,००० परिवारों के बीच कराए गए एक सर्वे के मुताबिक प्रत्येक ५ में से ४ परिवार २०२२ में प्रॉपर्टी, फोर व्हीलर या ज्वेलरी खरीदने की इच्छा नहीं रखते। इस डर की अहम वजह बढ़ती मुद्रास्फीति की दर और उस पर कोरोना महामारी से बना अनिश्चितता का माहौल बताया जा रहा है। इस डर का समाधान कर पाने में भी केंद्र सरकार काफी हद तक असफल रही है। बेशक, महामारी को वश में करना किसी भी सरकार के मुद्दे की बात नहीं है पर महंगाई पर काफी हद तक नियंत्रण केंद्र सरकार की नीतियों से किया जा सकता था। आप जानते ही हैं कि पिछले वर्ष की दूसरी छमाही में कच्चे तेल और गैस के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई थी, जिस पर केंद्र सरकार ने तब तक काबू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए, जब तक पानी आम आदमी के सिर के ऊपर से नहीं निकल गया और केंद्र को उससे सियासी नुकसान नहीं होने लगा। उसी तिमाही से खाद्य वस्तुओं में १५.५ प्रतिशत अंडा और मछली आदि के दामों में ९.६६ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नतीजे में लोगों की जेब कटने लगी है, तीसरी तिमाही के मध्य तक खुदरा महंगाई अपने उच्च स्तर पर पहुंच चुकी थी। सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर शुल्क कटौती का भी उस पर कोई असर नहीं पड़ा।
अक्टूबर में जो दर ४.४८ प्रतिशत थी वह नवंबर में ४.९१ प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जबकि खाद्य पदार्थों और ईंधन को छोड़कर अन्य चीजों पर मुद्रास्फीति तो ५.९ प्रतिशत पहुंच चुकी थी, जो गरीबी में आटा गीला करने के लिए काफी थी।

पिछले वर्ष २०२१ में वर्ष की तीसरी तिमाही आते-आते पेट्रोल के दाम रु. २२ प्रति लीटर और डीजल के दाम रु. ३२ प्रति लीटर तक बढ़ चुके थे। नवंबर महीने में कच्चे तेल के दाम ९१.७४ प्रतिशत बढ़े थे, तो अक्टूबर में ८०.५७ प्रतिशत बढ़े थे। नतीजा यह हुआ कि त्योहारों पर लोगों को महंगाई का तोहफा मिला। रसोई गैस की कीमतें बढ़ गईं, सब्सिडी लगभग खत्म हो गई, माल ढुलाई बढ़ गई। आप लोग जानते ही हैं कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से उसका असर सभी चीजों पर पड़ता है। कच्चे तेल के दाम इस वक्त ७ साल के उच्च स्तर पर हैं, जिसका कारण ओपेक देशों का नियंत्रित उत्पादन है। खासकर, सऊदी अरब की पहल पर ओपेक देश जान-बूझकर कम उत्पादन करके दामों को कृत्रिम रूप से बढ़ा रहे हैं। चूंकि यह दर वृद्धि कृत्रिम है, इसलिए इस पर कूटनीतिक तरीकों से काबू पाया जा सकता था पर केंद्र सरकार इस मोर्चे पर भी विफल साबित हुई है। सऊदी अरब से अच्छे संबंध होने व तमाम मोर्चों पर उनकी मदद करने के बावजूद केंद्र सरकार कच्चे तेल के उत्पादन के मुद्दे पर कूटनीतिक स्तर पर असफल रही है। कृषि आधारित देश की अर्थव्यवस्था, कोरोना की वजह से पहले ही प्रभावित हो रही है। उस पर कच्चे तेल की कृत्रिम मार औद्योगिक उत्पादन पर भी असर डाल रही है। ऐसे में केंद्र सरकार को कुछ ऐसी योजनाओं, नीतियों और राहत पर जोर देना चाहिए था, जो स्थिति को संभाल सके, क्योंकि महंगाई से सिर्फ आम आदमी परेशान नहीं होता, बल्कि इससे देश की आर्थिक उन्नति भी प्रभावित होती है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जिस वक्त नवंबर में महंगाई तीन दशकों में सर्वाधिक थी, महंगाई से त्राहिमाम मचा था, केंद्र सरकार ने आम जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित करने का एक और फैसला ले लिया और देशभर में सीएनजी और पीएनजी के दामों में तकरीबन ६२ फीसदी वृद्धि को मंजूरी दे दी। २०२० की शुरुआत में रु. ५० की दर पर मिलनेवाली सीएनजी नवंबर के आखिर तक अपने उच्चतम स्तर को पार कर चुकी थी जो अब जनवरी आते-आते रु. ६६ के पार चली गई है, जबकि पीएनजी पाइप रसोई गैस में भी रु. ४० प्रति यूनिट की दर गांठ चुकी है। चालू वित्त वर्ष में पीएनजी की कीमतों में २० प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होने से आम इंसान की रसोई पर भी इसका असर पड़ा है। इससे पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी महंगा होने की संभावना बन गई है।

दरअसल, चौतरफा महंगाई से आम इंसान के जीवन पर गहरा असर पड़ा है, जो इस वर्ष मार्च-अप्रैल के बाद और भी गहरा सकता है। जिससे समाज में अवसाद, तनाव और चिंता का वातावरण बन सकता है। इसलिए केंद्र सरकार को चाहिए कि वह सकारात्मक सोच के साथ राजकोषीय लाभ-हानि की चिंता किए बिना, आम इंसान के हित में कदम उठाए और ऐसी नीतियां लागू करें, जिससे देशवासी न केवल कोरोना, बल्कि महंगाई की मार से भी बच सकें। केवल कुछ जिंसों पर सीमा शुल्क में कटौती और आयात पर छूट से बात नहीं बननेवाली है। सो, जनता के लिए मैसेज यही है कि आप सतर्क हो जाइए। जब तक आपदा का यह संक्रमण काल खत्म नहीं होता। अपने खर्च का नियोजन कीजिए। समझ लीजिए कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर लगा विराम चुनावी है। देश की ५ विधानसभाओं के चुनावों ने इनके दामों को बढ़ने से थामे रखा है। अमूमन, आज के दौर में ऐसा होता है। एक बार चुनाव खत्म हुए और इन पर लगा नियंत्रण हटा कि बाजार में सब कुछ महंगा होने लगेगा। महंगाई बेलगाम हो जाएगी। इस वक्त अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के भाव ८७ डॉलर प्रति बैरल हैं। सिर्फ दिसंबर के महीने में ही इसमें १९ डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि हुई है, जो ग्राहकों तक अभी तक ट्रांसफर नहीं की गई है। उस पर अंदेशा यह भी व्यक्त किया जा रहा है कि आनेवाले वक्त में यानी २०२२ में कच्चे तेल के दाम १०० डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। इसलिए अपनी ईंधन की जरूरतों पर काबू पाइए, खपत पर नियंत्रण रखिए, बेवजह वाहन मत चलाइए, ट्रैफिक सिग्नल पर इंजन बंद कर दीजिए, टायरों की हवा को जांचते रहिए, छोटे से छोटे वाहन का इस्तेमाल कीजिए, इलेक्ट्रिकल गाड़ियां उपयोग में लाइए, छोटे-छोटे कामों के लिए बार-बार वाहन का इस्तेमाल मत कीजिए, उचित गियर में ही गाड़ियां चलाइए, भीड़-भाड़ के वक्त घर से बाहर न निकलिए। असल में ऐसा करके आप न केवल पैसों और ईंधन की बचत कर पाएंगे, बल्कि कोरोना के इस काल में खुद को महामारी से भी अछूता रख पाएंगे।

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