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बंगाल, बदला और बारूद

अनिल तिवारी
पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद हालात सामान्य लोकतांत्रिक संचार के बजाय टकराव, हिंसा और बदले की राजनीति की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। पुलिस की कार्रवाई में अब तक ४३३ गिरफ्तारियां और करीब २०० एफआईआर दर्ज होने की खबरें बताती हैं कि चुनावी तापमान परिणाम आने के बाद भी ठंडा नहीं पड़ा है।
सबसे गंभीर घटना भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ की हत्या है। मध्यग्राम में मोटरसाइकिल सवार हमलावरों द्वारा गोली मारकर की गई इस हत्या को शुभेंदु अधिकारी ने ‘प्री-प्लान्ड मर्डर’ बताया है। इस घटना के कुछ ही घंटे बाद ही नॉर्थ २४ परगना के पानीहाटी इलाके में बम हमला हुआ, जिसमें पांच भाजपा कार्यकर्ता घायल हो गए। इसके बाद भाजपा की ओर से आरोपों की धार और तेज हुई। अर्जुन सिंह ने सीधे अभिषेक बनर्जी पर हत्या की साजिश का आरोप लगाया, जबकि बसीरहाट में एक और भाजपा कार्यकर्ता को गोली मारे जाने की खबर ने तनाव को और गहरा दिया। भाजपा ने इन घटनाओं के लिए तृणमूल कांग्रेस पर बदले की राजनीति का आरोप लगाया है, जबकि टीएमसी ने आरोपों से इनकार किया है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है।
विडंबना यह है कि इसी समय एनसीआरबी की रिपोर्ट देश में अपराधों में छह प्रतिशत कमी का दावा कर रही है। २०२४ में ५८.८५ लाख अपराध दर्ज हुए, जबकि २०२३ में ६२.४१ लाख मामले थे। पर बंगाल की जमीन पर आंकड़ों से अधिक असर गोलियों, गिरफ्तारियों और राजनीतिक प्रतिशोध की भाषा का दिख रहा है। दूसरी ओर, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा को फ्लाइट में ‘जय श्रीराम’ नारेबाजी का सामना करना पड़ा। यानी बंगाल में चुनाव समाप्त जरूर हुआ है, पर राजनीतिक युद्धविराम नहीं हुआ है। जनता ने शासन के लिए मतदान किया था, लेकिन फिलहाल जनादेश के साथ बारूद, भय, बदले और साजिश की गंध भी तैर रही है।

बातचीत की मेज पर धमकी की भाषा


पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा दिख रहा है। एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की संभावना जताई जा रही है, दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी ने कूटनीति के दरवाजे पर युद्ध की दस्तक फिर तेज कर दी है। ट्रंप ने कहा है कि यदि ईरान पहले से तय शर्तें नहीं मानता, तो उस पर पहले से भी अधिक भीषण बमबारी की जाएगी। उनका स्पष्ट संदेश है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार विकसित नहीं करने देगा। ईरान अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है, जबकि ट्रंप ने दावा किया कि समझौता ‘बहुत संभव’ है। यानी बातचीत भी जारी है और धमकी भी। यही इस संकट की सबसे बड़ी विडंबना है। शांति-वार्ता के बीच ‘हम उन्हें खत्म कर देंगे’ जैसी भाषा बताती है कि अमेरिका ईरान को समझौते की मेज पर बराबरी के पक्षकार की तरह नहीं, बल्कि दबाव में झुकने वाले प्रतिद्वंद्वी की तरह देख रहा है।
उधर इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी इलाके में हिजबुल्लाह की एलीट रदवान फोर्स के कमांडर को निशाना बनाते हुए हमला किया। यह हमला अप्रैल के युद्धविराम के बाद बेरूत पर पहला बड़ा इजरायली हमला बताया जा रहा है। इससे युद्धविराम की विश्वसनीयता और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों पर सवाल उठे हैं। कुल मिलाकर पश्चिम एशिया में स्थिति यह है कि कूटनीति चल रही है, मगर बंदूकें खामोश नहीं हैं। ईरान जवाब सोच रहा है, अमेरिका दबाव बढ़ा रहा है और इजरायल अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में समझौता हुआ तो यह युद्ध-थकान का परिणाम होगा; और टूट गया तो अगला दौर पहले से कहीं अधिक विध्वंसक हो सकता है।

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