सामना संवाददाता / मुंबई
जैन शासन का अविचल प्राण और चौबीसों तीर्थंकर परमात्माओं का साक्षात अक्षरदेह अर्थात् ‘श्रुतज्ञान’ (आगम भगवंत) है। समय के प्रभाव से क्षीण हो रहे इस अमूल्य ज्ञानभंडार को लिपिबद्ध कर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने के परम पुण्य और भगीरथ कार्य में ‘श्री वर्धमान श्रुतगंगा’ संस्था आज संपूर्ण जैन समाज में अग्रणी एवं प्रेरणास्रोत बनकर उभरी है। श्रुतरक्षा के क्षेत्र में यह संस्था एक सशक्त स्तंभ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुकी है।
जैन इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब श्रुतज्ञान पर संकट आया, तब-तब महान आचार्यों और महापुरुषों ने आगे बढ़कर इसे सुरक्षित एवं अमर बनाने का कार्य किया। लगभग 1500 वर्ष पूर्व वल्लभीपुर में पड़े भीषण अकाल के समय, जब श्रुतज्ञान के लुप्त होने का भय उत्पन्न हुआ था, तब पूज्य देवर्धिगणि क्षमाश्रमणजी ने जिनागमों को ताड़पत्रों पर लिपिबद्ध करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। उसी महान परंपरा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करते हुए ‘श्री वर्धमान श्रुतगंगा’ दुर्लभ हस्तलिपियों एवं आगम ग्रंथों के संरक्षण का महाअभियान चला रही है।
शास्त्रकारों के अनुसार पंचम आरे के अंत तक जैन शासन का आधार केवल श्रुतज्ञान ही रहेगा। इसी शाश्वत सत्य को आत्मसात करते हुए संस्था आज के अंधकारमय समय में आत्माओं को सही मार्ग दिखाने वाले प्रकाशस्तंभ के रूप में कार्य कर रही है।
संस्था के अध्यक्ष संजयभाई जीवनलाल शाह, उपाध्यक्ष सुरेश देवचंद संघवी तथा मंत्री अशोक नरसी चरला के कुशल मार्गदर्शन में संस्था अनेक ऐतिहासिक एवं अनूठे कार्य कर रही है। परमात्मा की ज्ञानवाणी को शास्त्रोक्त एवं पारंपरिक पद्धति से पुनः हस्तलिखित किया जा रहा है। सांगानेरी कागज तथा विशेष पारंपरिक स्याही द्वारा तैयार किए जा रहे ये ग्रंथ प्राचीन परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। संस्था का उद्देश्य केवल ग्रंथों का संरक्षण करना नहीं, बल्कि घर-घर तक जिनागम के प्रति श्रद्धा, ज्ञानभक्ति और संस्कार पहुंचाना भी है। पाठशालाओं एवं संस्कार केंद्रों के माध्यम से नई पीढ़ी में धर्म, संस्कृति और जिनवाणी के प्रति गहरा अनुराग जागृत किया जा रहा है।
इसी क्रम में जैन समाज के लिए एक और गौरवपूर्ण समाचार सामने आया है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध ‘वेलकम कलेक्शन’ द्वारा संरक्षित लगभग 2,000 दुर्लभ जैन पांडुलिपियों को पुनः जैन समाज को लौटाने की ऐतिहासिक प्रक्रिया प्रारंभ हुई है। वर्ष 1919 में अविभाजित भारत के एक जैन मंदिर से प्राप्त ये पांडुलिपियां लंबे समय तक लंदन स्थित संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई थीं। अब एक सदी बाद इनकी वापसी को सांस्कृतिक न्याय और विरासत संरक्षण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इन दुर्लभ पांडुलिपियों में प्राकृत, संस्कृत और गुजराती भाषाओं में लिखित धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर का विशाल संग्रह मौजूद है। कई ग्रंथों में प्राकृतिक रंगों और स्वर्ण अलंकरण का अद्भुत प्रयोग भारतीय कला, संस्कृति और जैन परंपरा की समृद्धि को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पांडुलिपियों की वापसी नहीं, बल्कि जैन समाज की आस्था, इतिहास और पहचान की पुनर्प्रतिष्ठा है। इससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अमूल्य अवसर प्राप्त होगा। जैन समाज और विभिन्न धार्मिक संगठनों ने इस ऐतिहासिक निर्णय का हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया है। समाज के अग्रणियों के अनुसार, यह पहल विश्वभर में भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन और श्रुतज्ञान के प्रति बढ़ते सम्मान का प्रतीक है।
